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सुषमा स्वराज से लेकर अरुण जेटली तक, राजधानी के रणनीतिकारों को भुलाया नहीं जा सकता

आर राजगोपालन Published by: आर. राजगोपालन Updated Sun, 25 Aug 2019 01:46 AM IST
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Sushma Swaraj, Arun jaitley - फोटो : Social Media

सुषमा स्वराज के अचानक चले जाने के बाद अरुण जेटली का निधन गहरे धक्के से कम नहीं है। पिछले पांच वर्षों से उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था। एक भद्र जन, जो अपनी बात पूरी स्पष्टता के साथ कहता था। वह अच्छे नियोजक थे और राजधानी के मीडिया के साथ उनका ताल्लुक बहुत सहज था। हाजिरजवाबी और वन लाइनर के साथ उनके चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली मुस्कराहट, भूली नहीं जा सकेगी।

जेटली 2012 से ही नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की पैरवी कर रहे थे और इसकी रणनीति में भी शामिल थे। वास्तव में जब गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री मोदी ने मई, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला तब जेटली ने शुरुआती दो महीने तक नई दिल्ली की नौकरशाही को समझने में उनकी मदद की। वह लहरों के विपरीत तैरना जानते थे। 2013 में जब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर विचार हो रहा था और जब मोदी ने बातचीत के लिए नई दिल्ली आने से इनकार कर दिया था, तब यह अरुण जेटली ही थे, जो उन्हें गांधीनगर से नई दिल्ली लेकर आए थे।



वह एक अच्छे रणनीतिकार थे। जेटली क्रिकेट प्रेमी ही नहीं थे, बल्कि दिल्ली क्रिकेट क्लब के अध्यक्ष भी रहे और बाद में बीसीसीआई में भी उनकी दखल रही। दिल्ली के सफल वकील के रूप में जेटली के पास कई कारें थीं और उन सबका एक ही रजिस्ट्रेशन नंबर है, लेकिन ऐसा कोई अपनी समृद्धि और रसूख दिखाने के लिए नहीं था, बल्कि यह बताता है कि वह कितने पारदर्शी थे। राजनीति से लेकर कॉरपोरेट, लीगल प्रोफेशन, राजनय और मीडिया में उनके दोस्तों का बड़ा दायरा था। लगभग सभी पार्टियों में उनके मित्र थे, जिनमें नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और शरद पवार शामिल हैं। 

अरुण जेटली उन शुरुआती राजनेताओं में से थे, जिन्हें दिल्ली के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का एहसास हो गया था। उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के जमाने से कांग्रेस पार्टी के पतन और भाजपा के उभार को भांप लिया था। वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहते हुए शासन की बारीकियों को सीख चुके थे। लेकिन वास्तव में 2009 से 14 के दौरान विपक्ष का नेता रहते हुए उन्होंने अपनी मुकम्मल पहचान बनाई। 

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Sushma Swaraj, Arun jaitley - फोटो : Social Media
सुषमा स्वराज के अचानक चले जाने के बाद अरुण जेटली का निधन गहरे धक्के से कम नहीं है। पिछले पांच वर्षों से उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था। एक भद्र जन, जो अपनी बात पूरी स्पष्टता के साथ कहता था। वह अच्छे नियोजक थे और राजधानी के मीडिया के साथ उनका ताल्लुक बहुत सहज था। हाजिरजवाबी और वन लाइनर के साथ उनके चेहरे पर हमेशा छाई रहने वाली मुस्कराहट, भूली नहीं जा सकेगी।

जेटली 2012 से ही नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की पैरवी कर रहे थे और इसकी रणनीति में भी शामिल थे। वास्तव में जब गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री मोदी ने मई, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला तब जेटली ने शुरुआती दो महीने तक नई दिल्ली की नौकरशाही को समझने में उनकी मदद की। वह लहरों के विपरीत तैरना जानते थे। 2013 में जब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर विचार हो रहा था और जब मोदी ने बातचीत के लिए नई दिल्ली आने से इनकार कर दिया था, तब यह अरुण जेटली ही थे, जो उन्हें गांधीनगर से नई दिल्ली लेकर आए थे।

वह एक अच्छे रणनीतिकार थे। जेटली क्रिकेट प्रेमी ही नहीं थे, बल्कि दिल्ली क्रिकेट क्लब के अध्यक्ष भी रहे और बाद में बीसीसीआई में भी उनकी दखल रही। दिल्ली के सफल वकील के रूप में जेटली के पास कई कारें थीं और उन सबका एक ही रजिस्ट्रेशन नंबर है, लेकिन ऐसा कोई अपनी समृद्धि और रसूख दिखाने के लिए नहीं था, बल्कि यह बताता है कि वह कितने पारदर्शी थे। राजनीति से लेकर कॉरपोरेट, लीगल प्रोफेशन, राजनय और मीडिया में उनके दोस्तों का बड़ा दायरा था। लगभग सभी पार्टियों में उनके मित्र थे, जिनमें नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और शरद पवार शामिल हैं। 

अरुण जेटली उन शुरुआती राजनेताओं में से थे, जिन्हें दिल्ली के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का एहसास हो गया था। उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के जमाने से कांग्रेस पार्टी के पतन और भाजपा के उभार को भांप लिया था। वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहते हुए शासन की बारीकियों को सीख चुके थे। लेकिन वास्तव में 2009 से 14 के दौरान विपक्ष का नेता रहते हुए उन्होंने अपनी मुकम्मल पहचान बनाई। 

कहना न होगा कि मोदी और अमित शाह का लुटियन दिल्ली से परिचय करवाने वाले जेटली ही थे। उन्होंने समझ लिया था कि आडवाणी-वाजपेयी का युग समापन की ओर है और देश एक बड़े बदलाव का इंतजार कर रहा है। कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार के मामलों में उलझती जा रही थी और कुप्रबंधन के कारण उसकी जमीन खिसकती जा रही थी। मनमोहन सरकार नीतिगत पंगुता का शिकार हो गई। ठीक उसी दौर में उन्होंने आडवाणी का साथ छोड़कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में समर्थन किया। 

उन्होंने सफलता पूर्वक वेंकैया नायडु, सुषमा स्वराज, गोपीनाथ मुंडे और अनंत कुमार को भी इसके लिए राजी किया, जबकि ये सब भी आडवाणी के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने अपने हुनर का इस्तेमाल कर मोदी के खिलाफ दर्ज मामलों को निष्प्रभावी किया। उन्होंने सफलतापूर्वक यह आख्यान तैयार किया कि किस तरह से कांग्रेस पार्टी ने मोदी की छवि को खराब करने के लिए उनके खिलाफ राजनीति से प्रेरित झूठे मामले दर्ज किए हैं। उन्होंने संसद में अपने ब्लॉगों में और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये अपने इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया।  जेटली ने अमित शाह के खिलाफ दर्ज मामलों में भी ऐसी पहल की।

मई, 2014 के बाद की कहानी सबको पता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने उन्हें वित्त मंत्री बनाया था और रक्षा तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसी अहम जिम्मेदारी भी दी थी। जेटली ने निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, भूपेंद्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, मीनाक्षी लेखी और किरण खेर जैसी दूसरी पीढ़ी की नेताओं को आगे बढ़ाया। बाद में इनमें से कई मोदी सरकार में आज मंत्री हैं। वह दोपहर बाद अक्सर अपने बंगाली मार्केट कार्यालय में पत्रकारों से 'टिक्की पार्टी' में मुलाकात करते थे। उन्हें आलू टिक्की, गरम समोसा और चाय बहुत पसंद थी। 

पत्रकारों को उनके साथ गपशप का मौका तो मिलता ही था और कुछ अच्छे इनपुट भी। जेटली  बखूबी जानते थे कि मित्रों और लोगों को दिल कैसे जीता जाता है। उन्हें अपनी ताकत और कमजोरियों का एहसास था।
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