पिछले सप्ताह फिर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की तरफ से परमाणु युद्ध की धमकी आई। स्पष्ट शब्दों में थी यह धमकी : ‘हमारे पास परमाणु हथियार सिर्फ दिखावे के लिए नहीं हैं।’ रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान की धमकियां मायने नहीं रखतीं, क्योंकि भारत के किसी शहर तक परमाणु शस्त्र पहुंचाने की क्षमता उसके पास नहीं है। हो सकता है, यह बात सही हो, पर लेकिन क्या यह भी सही नहीं है कि जिसे अंग्रेज़ी में ‘डर्टी बम’ कहते हैं, उन्हें सूटकेस में डालकर सीमा के इस पार फेंकना संभव है? इसके लिए किसी मिसाइल की आवाश्यकता नहीं है। ऐसी धमकियों को गंभीरता से भारत को इसलिए भी लेना पड़ेगा, क्योंकि पाकिस्तान कई बार साबित कर चुका है कि न सिर्फ जेहादी गुट ऐसा करना चाहते हैं, बल्कि पाक सेना में भी जेहादी जनरल हैं, जिन्हें भारत से इतनी नफरत है कि भारत की बर्बादी के लिए वे खुद के बर्बाद होने को भी तैयार हो सकते हैं।
जिस पाकिस्तान के बारे में हमारे कई बुद्धिजीवी और पत्रकार अब भी कहते हैं कि उस देश के लोग हमारे भाई हैं, बिलकुल हम जैसे हैं, और अगर इस्लाम की दीवार न होती, तो हमारे बीच कोई फर्क नहीं रहता, वे नहीं जानते कि पाकिस्तान अब बदल गया है। इस परिवर्तन की शुरुआत करीब तीस साल पहले हुई थी, जब जियाउल हक पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे और उन्होंने शरीयत कानून लागू कर सोचे-समझे ढंग से अपने मुल्क में इस्लामीकरण लाने की मुहिम शुरू की थी। साथ ही अरब देशों से रिश्ते मजबूत कर पाकिस्तान को भारत से दूर करने का भी सुनियोजित प्रयास किया। सो धीरे-धीरे पाकिस्तान में मिली-जुली संस्कृति की विरासत खत्म होती गई। मैंने जुलाई, 2001 में जमीनी तौर पर इस परिवर्तन को देखा था, जब एक टीवी कार्यक्रम के सिलसिले में लाहौर और कराची गई थी।
यह वह समय था, जब कारगिल युद्ध के बाद परवेज मुशर्रफ अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने भारत आने वाले थे। मैंने दिन भर टीवी क्रू के साथ लाहौर की सड़कों पर बिताया था। तब मैं जहां भी गई, मुझे कट्टर लोग मिले। एक गांव में जब मैंने लोगों से पूछा कि उन्हें भारत की हिंदी फिल्में कैसी लगती हैं, तो एक एक बुजुर्ग ने कहा कि इन फिल्मों के जरिये भारत बहुत ‘बेशर्म मुल्क’ दिखता है, क्योंकि औरतों का लिबास बहुत बेशर्म है। उन्हें मेरे लिबास से भी तकलीफ थी, क्योंकि मेरी कमीज के आस्तीन लंबे नहीं थे। मुझे यह भी सुनने को मिला कि पाकिस्तानी महिलाएं ‘गैर मर्दों’ के साथ काम नहीं करतीं। कश्मीर को लेकर मैंने लोगों में इतना गुस्सा देखा कि लाहौर के पुराने हिस्से में तो हिंसक भीड़ ने मुझे घेर लिया था। कहने का मतलब यह कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती का जो सपना हमारे कुछ राजनेता देखते हैं, वह निकट भविष्य में साकार नहीं होने वाला।
मैं ऐसा इस आधार पर कह रही हूं, क्योंकि पाकिस्तान के साथ मेरा करीबी रिश्ता रहा है। जब पाकिस्तान बना, तब मेरे पिताजी के परिवार ने वहीं रहने का फैसला किया था। लेकिन जब दंगों ने उनका वहां रहना असंभव कर दिया, तब वे भारत आए। जियाउल हक के समय जो बदलाव हुए, तभी हमारे राजनेताओं को सतर्क हो जाना चाहिए था। अब भी हमारे यहां कुछ वामपंथी दल हैं, जो पाकिस्तान से दोस्ती की बातें करते हैं। ऐसे लोगों को पाक रक्षा मंत्री की बात ध्यान से सुननी चाहिए।