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दोस्ती या ढोंग?

तवलीन सिंह Updated Sun, 02 Dec 2018 06:39 PM IST
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तवलीन सिंह

सिख श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर गुरुद्वारे तक पहुंचने के लिए गलियारे की नींव रखकर क्या पाकिस्तान वास्तव में हमारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है या एक नया ढोंग रच रहा है? पिछले सप्ताह सीमा के उस पार जब इस नए रास्ते की नींव रखी गई, तो भारत में इस सवाल को लेकर विचार इतने अलग थे कि प्रधानमंत्री स्वयं नहीं तय कर पाए कि हो क्या रहा है। एक तरफ तो उन्होंने बर्लिन की दीवार के गिराए जाने के साथ इस घटना की तुलना की, तो दूसरी तरफ अपनी विदेश मंत्री से कहलवाया कि इस नए रास्ते का मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि भारत अब बातचीत का सिलसिला दोबारा शुरू करने के लिए तैयार है। 1989 में बर्लिन की दीवार गिराकर दोनों जर्मनी को एक कर दिया गया था। वह घटना इतनी ऐतिहासिक थी कि एक दीवार के गिरने से देश का पूरा इतिहास बदल गया था।



हमारे दोनों देशों के बीच ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। लेकिन यह भी कहने की आवश्यकता है कि पाकिस्तान ने दोस्ती का हाथ बढ़ाने की कोशिश की है। हमारी तरफ से अगर इस दोस्ती पर विश्वास करना कठिन है, तो इसलिए कि हम बहुत बार धोखा खा चुके हैं। पाकिस्तान के साथ दोस्ती का प्रयास नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को बुलाकर किया था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री आए, लेकिन सेनाध्यक्ष की मर्जी के बिना, सो पाकिस्तान के सैन्य शासकों ने उनको राजनीतिक मैदान से हटा ही दिया। चूंकि पिछले सप्ताह पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष करतारपुर पहुंचे थे, तो क्या यह समझा जाए कि दोस्ती की इस नई कोशिश का सेना समर्थन करती है? अगर करती है, तो कई प्रश्न अपने आप उठने लगते हैं।


अमन-शांति के रास्ते पर अब अगर पाकिस्तान के जनरल चलना चाहते हैं, तो अभी तक उन्होंने कश्मीर घाटी में अपने जेहादी हमले बंद क्यों नहीं किए हैं? करतारपुर में पिछले सप्ताह जनरल बाजवा के साथ एक ऐसा व्यक्ति क्यों दिखा, जो खालिस्तान बनाने के लिए पाकिस्तान की सहायता ले रहा है और हाफिज सईद जैसे दरिंदे के साथ दोस्ती रखता है? पाकिस्तान वास्तव में अमन-शांति चाहता है, तो इमरान खान ने करतारपुर में क्यों कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच एक ही समस्या है और उस समस्या का नाम कश्मीर है?


कश्मीर को भारत अपनी अंदरूनी समस्या मानता है और हमेशा मानता रहेगा। जिस समस्या को लेकर हम पाकिस्तान के साथ बात करना चाहते हैं, उस समस्या का नाम है जेहादी आतंकवाद। जब तक हाफिज सईद जैसे व्यक्ति 26/11 के बाद भी आजाद घूमते रहेंगे, तब तक हम कैसे विश्वास कर सकते हैं कि पाकिस्तान वास्तव में हमारे साथ दोस्ती करना चाहता है? सो दोस्ती, अमन, शांति बहुत दूर की बातें हैं अभी। निकट भविष्य में इनके बारे में सोचना भी बेकार है। भारत देखना चाहता है कि पाकिस्तान शांति के मार्ग पर कितनी दूर चलना चाहता है और इस मार्ग पर पांव रखना भी चाहता है या नहीं। क्या हाफिज सईद को भारत सरकार के हवाले करने के लिए पाकिस्तान सरकार राजी होगी? सईद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जेहादी आतंकवादी घोषित कर दिया गया है। भारत के पास सबूत हैं कि बतौर लश्कर सरगना मुंबई हमले की साजिश इस व्यक्ति ने रची थी। भारत की भूमि पर वह जेहादी आतंकवाद की सबसे बड़ी घटना थी, जिसमें 166 बेगुनाहों को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मौत के घाट उतारा था। लेकिन पाकिस्तान की सरकार ने आज तक एक भी व्यक्ति को दंडित नहीं किया है। ऐसे में, क्या पाकिस्तान की दोस्ती पर विश्वास करना चाहिए?

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