इस तथ्य के बावजूद कि सशस्त्र समूहों ने खुद को साबित किया है और हम सबको दिखाया है कि वे कट्टर हैं, अफगान सरकार शांति चाहती है-यह कहना था मार्च, 2018 में सुरक्षा परिषद की बैठक में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैय्यद अकबरुद्दीन का। वर्ष 2015 में इसी तरह के घटनाक्रम पर भारत ने प्रतिकूल प्रतिक्रिया दी थी, जब भारत ने गनी का झुकाव इस्लामाबाद की तरफ देखा था, अब भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 2018 की गतिविधियों को समर्थन देने का आह्वान किया है।
नई दिल्ली ने अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग प्रतिक्रिया क्यों की? यह सवाल इसलिए उठता है, क्योंकि भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण अफगान के आधिकारिक नेतृत्व वाली सुलह प्रक्रियाओं का समर्थन करने का रहा है। तथ्य यह है कि काबुल ने ही वर्ष 2015 और 2018 में सुलह प्रक्रियाओं का नेतृत्व किया। भारत ने हाल ही में मॉस्को द्वारा आयोजित बहुपक्षीय वार्ता में गैर आधिकारिक रूप से हिस्सा लिया, जिसमें अफगान तालिबान के प्रतिनिधि भी शामिल थे, पर गनी का एक भी विश्वस्त शामिल नहीं था। अफगानिस्तान में भारत के बढ़ते अलगाव के कारण इस सवाल का जवाब ढूंढना आवश्यक है। अतीत में, खासकर 1990 के दशक के दौरान इसी तरह के अलगाव और पाकिस्तान के बढ़ते असंगत प्रभाव की भावना ने भारत को अफगानिस्तान में पाकिस्तान विरोधी गुटों के समर्थन के लिए प्रेरित किया था। भविष्य में इस सक्रियता की पुनरावृत्ति के कारण अफगान टकराव के समाधान के बजाय उसके बढ़ने की आशंका है।
काबुल के शांति प्रस्ताव पर भारत की विरोधाभासी प्रतिक्रिया का स्रोत अमेरिका की अफगान नीति पर उसकी धारणा और उसके विश्वास में निहित है। अमेरिका पर इस तरह की निर्भरता भारत की अफगान नीति को गहरे संकट में डालती है। पहला, अगर अमेरिका वार्ता में पाकिस्तान को ज्यादा तवज्जो दे या अल्पकालीन सूचना पर अपने जवानों की मौजूदगी घटा दे, तो यह भारत के विकल्पों को सीमित करता है। दूसरा, यह दर्शाता है कि नई दिल्ली या तो अफगान संघर्ष से बहुत प्रतिरक्षित हो गई है या वास्तव में इसे खत्म करने के प्रति बहुत अनजान हो गई है। तीसरा, भारतीय नीति-निर्माताओं ने सोवियत-अफगान युद्ध से कोई सबक नहीं सीखा है। अमेरिका पर भारत की अफगान नीति की निर्भरता 1980 के दशक में मॉस्को पर निर्भरता से अलग नहीं है। तब भारत युद्ध खत्म करने के प्रति सोवियत संघ की गंभीरता या उसकी संरचनात्मक समस्या को समझने में विफल रहा, भले ही पाकिस्तानी मांगों को स्वीकार करना इसकी जरूरत हो। हालांकि आज भारत ट्रंप के राष्ट्रपति काल से जुड़ी अनिश्चितता को समझता है, फिर भी अफगानिस्तान में अपने लिए जगह बनाना और अपनी अफगान नीति की वकालत करना बाकी है।
भारत की अफगान नीति का सबसे प्रमुख वाहक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक संतुलन पर प्रहार करने की उसकी इच्छा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच निरंतर, संभवतः अपरिवर्तनीय और व्यापक शक्ति अंतर को देखते हुए यह एक महात्वाकांक्षी इच्छा है। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अफगान तालिबान और अफगानिस्तान के बीच सुलह शर्तों में पाकिस्तान हस्तक्षेप नहीं करेगा।
अफगान युद्ध का विरोध करते हुए ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद इसे खत्म करने का वायदा किया था। फिर भी फरवरी और अगस्त, 2017 के बीच उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल एच. आर मैकमास्टर ने मूल रूप से भिन्न नीति लागू करने में सफलता प्राप्त की। अफगानिस्तान से समय से पहले जवानों को वापस नहीं बुलाने पर दृढ़ मैकमास्टर ने नीति समीक्षा शुरू की। उनका उद्देश्य यह जांचना था कि क्षेत्र में लंबे समय तक अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पर क्षेत्रीय शक्तियां कैसी प्रतिक्रिया देती हैं और ऐसा करने के लिए वह प्रशासन के भीतर पर्याप्त समर्थन हासिल करना चाहते थे। इन दोनों में वह सफल रहे।
चीन के साथ अमेरिका के खराब रिश्तों, कुछ अफगान तालिबान गुटों को रूस द्वारा हथियार प्रदान करने और पाकिस्तान द्वारा पश्चिमी एवं अफगान बलों की आलोचना को देखते हुए मैकमास्टर ने विश्वसनीय क्षेत्रीय साझेदार के रूप में अपनी अफगान नीति पहल को देखने के लिए भारत को शामिल किया। अफगानिस्तान में अमेरिकी रणनीति में भारत की (अस्थायी रूप से) ऊंची भूमिका ट्रंप के अगस्त 2017 के भाषण में दिखी। अमेरिका की अफगान नीति में ऐसे बदलाव से पता चलता है कि भारत ने गनी के 2018 के सुलह प्रस्ताव पर क्यों सतर्क प्रतिक्रिया दी। ट्रंप के भाषण ने भविष्य की रणनीतिक स्पष्टता की पेशकश की, जिसका भारत के सत्ता गलियारों में स्वागत किया गया। बढ़ते अमेरिकी सैन्य समर्थन के वायदे ने भारत में यह विश्वास व्यक्त किया कि 2001 से गनी द्वारा शांति की कोशिशों से अफगानिस्तान में उसकी मौजूदगी को कोई खतरा नहीं है। इसने वह संतुलन सुनिश्चित किया, जो भारत काबुल और इस्लामाबाद के बीच चाहता है।
जुलाई में अफगान तालिबान के साथ अमेरिका की सीधी बातचीत ने भारत को फिर असमंजस की स्थिति में डाल दिया। अपने पूर्ववर्ती के विपरीत मोदी सरकार ने अफगान तालिबान के साथ एक स्वतंत्र चैनल बनाने को कोई महत्व नहीं दिया। पाकिस्तान के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्ते भी निचले स्तर पर पहुंच गए। अगर अमेरिका ने इस नई पहल के हिस्से के रूप में अफगान तालिबान के साथ समझौता करने का फैसला किया, तो अफगानिस्तान में भारत के रणनीतिक रूप से कमजोर और राजनयिक रूप से अलग-थलग पड़ने की आशंका है।
सीमित क्षमताओं और स्थायी रणनीतिक हित वाले पड़ोसी के रूप में, भारत को यह चुनने की सुविधा नहीं है कि अफगानिस्तान में कैसे, कब, क्यों और किसके साथ जुड़ना है। पाकिस्तान के बरक्स अल्पकालीन लाभ के बारे में सोचने के बजाय नई दिल्ली को एक वास्तविक सामाजिक सुलह प्रक्रिया का समर्थन करके अफगान संघर्ष को खत्म करने के लिए दीर्घकालीन रणनीति के बारे में सोचना चाहिए। इसके लिए मॉस्को की बैठक में भारत का अपने अनुभवी, सेवानिवृत्त राजनयिकों को भेजने का फैसला एक समझदारी भरा कदम था।