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फ्रेंच फ्राई, भारत न भाई: खस्ताहाल स्कूलों पर नाराजगी से उपजा आंदोलन, इससे भारत में कई क्रांतिकारी दुष्प्रेरित

सार

खस्ताहाल स्कूली शिक्षा के खिलाफ नाराजगी से उपजा आंदोलन अब लग्जरी पूंजीवाद की वैश्विक राजधानी पेरिस सहित फ्रांस के कई शहरों को फ्रेंच फ्राइज की तरह तल रहा है। भारत में इससे दुष्प्रेरित कई क्रांतिकारी जो फ्रांस में हुआ, उसके यहां भी होने की कामना कर रहे हैं।
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फ्रांस में छात्र आंदोलन - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एजेंसी
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विस्तार
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फ्रांस जल रहा है। उसके दुश्मन उसे ‘फ्रेंच फ्राइज’ की तरह तल रहे हैं। उसके साथ इटली, स्पेन, यूनान, पुर्तगाल, बेल्जियम, ट्यूनीशिया, अल्बानिया और अर्जेंटीना आदि देश भी ऐसे ही आंदोलनों की गिरफ्त में हैं। रूसो के ‘आधुनिक समाज’ को संभव करने वाला ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ (सामाजिक समझौता) और दुनिया को जनतंत्र का रास्ता दिखाने वाली ‘फ्रांसीसी क्रांति’ के तीनों आदर्श-‘समानता, बंधुत्व व आजादी’ भूलुंठित पड़े हैं।

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फ्रांस का सवा सौ साल पुराना ‘टाउन हॉल’ जलाया जा चुका है। ‘जोन ऑफ आर्क’ की मूर्ति को ‘हिजाब’ पहनाया जा चुका है। दुनिया के सबसे दुर्लभ और महंगे फैशन ब्रांडों के शोरूमों में सजे ब्रांडों को लूटकर उनमें आग लगाई जा चुकी है। ‘बर्किन’ बैग एक ऐसा ही सबसे महंगा ब्रांड है, जिसे हर कोई नहीं खरीद सकता। लगभग पांच लाख डॉलर (4.1 करोड़ रुपये) की कीमत का यह ‘सुपर फैशन बैग’ परंपरा से दुनिया के सबसे अमीर व नामी लोगों को ही मिल सकता है। इसकी ‘प्री बुकिंग’ कुछ गिने-चुने लोगों के वंश की वास्तविक कुलीनता की जांच के बाद ही होती है। बरसों तक इसकी सप्लाई का इंतजार किया जाता है। दुनियाभर की कुछ संपन्नतम महिलाएं इस बैग पर ‘इतराती’ देखी जा सकती हैं। ऐसे नामी ‘ब्रांड’ के शोरूम के अलावा ‘लुई वितों’, ‘शनैल’, ‘क्रिश्चियन डायोर’, ‘रोलेक्स’, ‘सोनोरन’ ‘एपल स्टोर’ आदि जितने ‘लग्जरी पूंजीवाद’ के ब्रांड हैं, उनके शोरूमों को लूटा जा चुका है। फिर भी, फ्रांस का मीडिया और कुछ सत्तासीन, इस कड़वे यथार्थ से आंख मूंदकर कहते आ रहे हैं कि छात्रों का यह आंदोलन शांतिपूर्ण था, आंदोलनकारियों ने कुछ नहीं किया, जो हुआ, उसकी जिम्मेदारी प्रशासन और पुलिस पर है।

यह सच है कि फ्रांस के ‘लग्जरी पूंजीवाद’ के ‘ग्लोबल प्रतीक’ अमीर-गरीब की खाई को बढ़ाने वाले रहे हैं। बहुत-से दंगाई उनको लूटकर, उनको विकृत करके ही उनसे बदला लेने का भ्रम पालते हैं। जबकि, इस लूटमार के बाद वे और भी बड़ा ‘क्रेज’ बन उठते हैं, उनकी मांग बढ़ जाती है। ‘लग्जरी पूंजीवाद’ और भी पनपता है। कुछ के लिए ये ‘विलासिता ब्रांड’ शैतान की तरह भी हो सकते हैं।
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कुछ बरस पहले अमेरिका के गिराए गए ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ के दोनों टॉवरों को भी शैतान का प्रतीक मानकर उड़ाया गया था। इसका अर्थ हुआ कि फ्रांस को आग और लूटमार के हवाले करने वाला आंदोलन कोई शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन नहीं है, बल्कि एक प्रकार का ‘वर्ग युद्ध’ भी है। इस आग में कुछ ऐसे ‘नागरिक’ भी निशाना बनाए गए, जो इन दंगों से पहले तक ‘शरणार्थियों’ के पक्ष में बोला करते थे और उनकी मदद करते थे। इनमें से एक महिला ने लुटने-पिटने के बाद बताया कि वह तो ऐसे बहिरागत शरणार्थियों की तरह-तरह से मदद करती रही है, लेकिन जब उसकी दुकान को लूटना शुरू किया, तो लुटेरों ने उसकी एक गुहार तक न सुनी। ऐसे ही एक फ्रांसीसी नागरिक की ‘आप बीती’ बताती है कि वह स्वयं शरणार्थियों के ‘स्वागत’ में पोस्टर लेकर उनकी रैली में हमेशा खड़ा रहता था, लेकिन लुटेरों ने लूटते वक्त उसकी एक न सुनी और इस तरह उसे भी उसकी ‘हमदर्दी’ की सजा दी गई।

पश्चिमी मीडिया के अनुसार ‘लग्जरी पूंजीवाद’ की वैश्विक राजधानी पेरिस समेत फ्रांस के कई शहरों को दंगों की आग में जलाने वाला हिंसक आंदोलन शुरू में खस्ताहाल स्कूली शिक्षा के खिलाफ नाराजगी से उपजा था। बाद में, बढ़ी व्यापक नाराजगी का कारण, ‘जनहित में सरकारी खर्चे में कटौती’ के साथ ‘रिटायरमेंट’ की उम्र बढ़ाने की नीति भी रही। कुछ समय बाद ही इस आंदोलन को कुछ कट्टरतावादी तत्वों ने अगवा कर लिया और इसीलिए इस लूटमार और आगजनी को ‘सिलेक्टिव तरीके’ से किया गया। लेकिन, मजाल कि यूरोपीय मीडिया ने इसके पीछे काम करने वाली ‘डीप स्टेट’ की भूमिका को लेकर कुछ भी कहा हो। अलबत्ता, बहुत से पश्चिमी टिप्पणीकार अब भी इस ‘जेन-जी आंदोलन’ को ‘1968 वाले छात्र आंदोलन’ का ‘दोहराव’ मात्र कहते हैं। लेकिन, ‘जेन-जी’ की पदावली में कहें, तो यूरोप के कई देशों में चल रहे इस ‘जेन-जी’ आंदोलन के पीछे सबसे बड़ा कारण दुनिया की ‘वूका मेंटेलिटी (मानसिकता)’ है, जिसका मतलब मिजाज से ‘अस्थिर, अनिश्चित, जटिल तथा अस्पष्ट’ होना है। और, यही ‘अराजकतावादी’ एजेंडा है। फ्रांस को जलता देख स्वयं ‘वूका मेंटेलिटी’ के उस्ताद डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि शरणार्थियों ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है। उसे अपने ‘बॉर्डर सील’ कर देने चाहिए...फ्रांस जल रहा है...।

फ्रांस के इस आंदोलन की लूटमार और आगजनी को देखकर अपने यहां के भी कुछ विपक्षी तत्व उछलते दिखते हैं। एक देसी लेनिन तो पहले ही ‘रेजीम चेंज’ (तख्तापलट) का आह्वान और इस प्रक्रिया में हो सकने वाले ‘खून-खराबे’ की बात कर चुके हैं। एक देसी रोजा लुक्सेंबुर्ग बांग्लादेश की तरह यहां भी ‘रेजीम चेंज’ की मांग करती दिखी हैं। एक विपक्षी नेता, सत्ता से ‘मिलीभगत’ के ‘आरोप’ के बदले आंदोलनकारियों द्वारा अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट को जला डालने को भी उचित ठहराते दिखे हैं। इसी तरह विपक्ष के एक नेता उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का नाम लेकर कह चुके हैं कि अगर  कानून-व्यवस्था ठीक से चलाना आपके बस में नहीं है, तो इस्तीफा दे दें...हम नया मुख्य न्यायाधीश चुन लेंगे...और अपने एक देसी मार्क्स सर तो पहले ही कह चुके हैं कि जनतंत्र संसद से नहीं, सड़क से चलेगा।

सोशल मीडिया पर सक्रिय अनेक क्रांतिकारी ज्ञानीजन तो हर दिन हर पल ‘सत्ता परिवर्तन’ की मांग करते रहते हैं। कई तो यह तक कहने लगे हैं कि जो फ्रांस में हो रहा है, यहां भी हो जाए। यानी कि ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’। ऐसे में एक चैनल का एंकर कहता है कि सर जी! अगर आप ऐसा करेंगे, तो क्या ‘राष्ट्रप्रेमी’ फ्रांसीसियों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? ऐसे में, हम तो यही कहेंगे-‘फ्रेंच फ्राई, भारत न भाई!’

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