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खरीदारी बदल रही है: भारतीय ऑनलाइन खुदरा बाजार 90 अरब डॉलर के पार! समग्र अर्थव्यवस्था के लिए कौन से सुखद संकेत?

अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Thu, 22 Oct 2026 08:25 AM IST

सार

ऐसे वक्त में, जब दुनियाभर में महंगाई तेजी से बढ़ रही है, तब भारतीय ऑनलाइन खुदरा बाजार के 90 अरब डॉलर के पार पहुंचने का अनुमान डिजिटल अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को दर्शाने के साथ समग्र अर्थव्यवस्था के लिए भी एक सुखद संकेत है।
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इस वर्ष ऑनलाइन खुदरा बाजार के 90 अरब डॉलर (करीब आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक) के पार पहुंचने का अनुमान - फोटो : Adobe Stock


ऐसे समय में, जब दुनियाभर में महंगाई बढ़ रही है और लोगों के जीवनयापन की लागत तेजी से बढ़ रही है, तब भारतीय ई-कॉमर्स उद्योग में तीव्र विकास अर्थव्यवस्था के लिए भी एक सुखद संकेत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे मुख्य कारण लोगों की खर्च करने योग्य आय में वृद्धि, तेजी से डिजिटल होना, ‘क्विक कॉमर्स’ में उछाल और द्वितीय व तृतीय श्रेणी के शहरों से बढ़ती मांग है।


दरअसल, भारतीय उपभोक्ताओं की खरीद की प्रवृत्ति पिछले कुछ वर्षों से तेजी से बदली है। आमतौर पर त्योहारों के मौसम में खरीदारों के स्वागत में दुकानें सज-धज कर तैयार रहती हैं, पर अब दुकानों पर जाकर खरीदारी करने के बजाय लोग घर बैठे ऑनलाइन खरीदारी को तवज्जो देने लगे हैं। यूपीआई भुगतान की आसान सुविधा, बढ़ते इंटरनेट उपयोगकर्ता और बेहतर होती लॉजिस्टिक्स एवं आपूर्ति शृंखला ने ऑनलाइन खरीदारी को सुलभ बनाया है।


जेनरेटिव एआई के बढ़ते इस्तेमाल से उत्पादों की खोज, उपभोक्ताओं को उनकी पसंद के अनुरूप सुझाव देने और खरीदारी के अनुभव को बेहतर बनाने की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। ‘नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी सरकारी पहलें, कनेक्टिविटी को बेहतर बनाकर, लॉजिस्टिक्स को सुव्यवस्थित और डिजिटल पहुंच का विस्तार करके ई-कॉमर्स को बढ़ावा दे रही हैं। ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स के बढ़ने से वेयरहाउसिंग, पैकेजिंग, आपूर्ति शृंखला और गिग इकनॉमी (डिलीवरी पार्टनर) के क्षेत्र में लाखों नए रोजगार पैदा हो रहे हैं।


हालांकि, छोटे स्थानीय दुकानदारों एवं पारंपरिक खुदरा विक्रेताओं को इससे बड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, गिग इकनॉमी में काम करने वाले डिलीवरी कर्मियों के लिए रोजगार की स्थिरता, आय और सामाजिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण सवाल हैं। लेकिन, यह जरूर है कि इस बदलाव के चलते एमएसएमई, यानी छोटे और मध्यम उद्योगों तथा स्थानीय ब्रांडों के राष्ट्रीय बाजार तक सीधी पहुंच बढ़ने से उनके उत्पादों की मांग बढ़ रही है।


साथ ही, इससे डिजिटल पेमेंट गेटवे, फिनटेक और लॉजिस्टिक्स तकनीक में निवेश बढ़ रहा है, जो कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था के विकास का ही परिचायक है। हालांकि, इस विकास की सफलता केवल बाजार के आकार से नहीं आंकी जानी चाहिए। यह भी जरूरी है कि छोटे कारोबारियों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के अवसर मिलें, डिलीवरी कर्मियों के हित सुरक्षित रहें और उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाओं का लाभ मिले।

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