नया साल शांति लाए, अन्याय और अत्याचार में कमी लाए, ऐसा हम हर साल सोचते हैं। इस साल भी ऐसा ही सोच रहे हैं। पर बंगलूरू में नए साल के आगाज की शाम बहुत बुरी गुजरी। कुछ ही दिन पहले मैंने दंगल फिल्म देखी थी। उसमें एक दुस्साहसी पिता अपनी दो बेटियों को कुश्ती सिखाने के बाद एक दंगल में ले जाता है। वहां वह कहता है कि बड़ी बेटी को वह दंगल में किसी पहलवान से लड़ाना चाहता है। जाहिर है कि पहलवान पुरुष होगा, क्योंकि उसकी बेटी कुश्ती लड़ने वाली अकेली लड़की थी। इस बात पर आश्चर्य जताया जाता है कि एक पिता अपनी बेटी और अपने खानदान की इज्जत को धूल में मिलाने के लिए कैसे तैयार हो सकता है। उससे कहा जाता है कि उसे भले ही अपनी और अपने परिवार की इज्जत का ख्याल नहीं है, पर दंगल के आयोजकों को तो है, इसलिए लड़की को दंगल में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इसी बीच, एक अक्लमंद आदमी आयोजकों को समझाता है कि लड़की को कुश्ती लड़ते देखने के लिए पुरुषों की भीड़ जुट जाएगी, जो इस नए किस्म के आइटम नंबर को देखने के लिए पैसे खर्च करने को तैयार होगी। तब उस लड़की को दंगल में भाग लेने की इजाजत मिलती है। बड़ा ही डरावना दृश्य पेश होता है। उसे लड़ता देखने वाले भूखे भेड़ियों जैसे मुंह बाए, अश्लीलता में डूबी आंखें फाड़े पुरुषों का दृश्य।
चलिए, वह तो हरियाणा है। लेकिन बंगलूरू? वह तो आधुनिक, विकसित भारत का प्रतीक है। बंगलूरू का मतलब है आजादी। पढ़ने की, नौकरी करने की, पब में जाने की, जैसा मन हो, वैसा लिबास पहनने की, अपने मन-मुताबिक जिंदगी जीनेे की आजादी। लेकिन 31 दिसंबर की रात उस सच्चाई का पता चल गया कि कन्याकुमारी से कश्मीर तक हम सब एक हैं। हरियाणा से बंगलूरू तक हम एक हैं। कम से कम महिलाओं के बारे में हमारी सोच एक जैसी है।
भूखे भेड़ियों की भीड़ ने 31 दिसंबर की रात को नए साल की खुशियां मनाती लड़कियों और महिलाओं पर जिस तरह हल्ला बोला; जिस तरह उनके चेहरों, बालों और शरीरों पर आक्रमण किया; जितने निडर और बेलगाम तरीके से उसने उन्हें पत्थर की लकीर जैसी लक्ष्मण रेखाओं की याद दिलाई-इन सबने हम तमाम महिलाओं को अपनी औकात बताने का काम किया।
अगर कुछ समझना बाकी था, तो हमारे रक्षकों ने वह भी समझा दिया। कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा कि अगर महिलाएं पाश्चात्य वेश-भूषा में सड़कों पर निकलेंगी, तो उनकी इज्जत सुरक्षित नहीं रह सकती। समाजवादी पार्टी के संसद बोले कि हमारे देश की महिलाओं को अपनी इज्जत का ख्याल खुद ही करना चाहिए। अगर वे रात-बिरात घूमे-फिरेंगी, तो फिर यही सब होगा।
साफ है कि महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की अवहेलना के मामले में भारत एक है। आशा की हल्की-सी किरण जो कहीं से निकली हुई दिख रही है, वह बस यह है कि महिलाएं (और बहुत सारे सभ्य पुरुष) इस कठोर यथार्थ को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हीं के विरोध का नतीजा है कि बंगलूरू की जो पुलिस पहले कह रही थी कि 31 दिसंबर की रात को उन्हें किसी तरह की कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई, वही अब अपराधियों की तलाश में जुट गई है। महिलाएं भी इज्जत शब्द को अब समझने लगी हैं। यह उनके माथे का टीका नहीं, बल्कि वह खूंटा है, जिससे उन्हें बांधकर रखा गया है। हमलावरों से बचकर नहीं, बल्कि बंधनों को तोड़कर ही वे आदर-सम्मान के साथ सुरक्षित रह सकती हैं।
-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य