एक समय था, जब आदमी कहता था कि मरने की फुर्सत नहीं है। आदमी का यह जुमला सुनकर ही लगता है कि कोरोना आदमी के फुर्सत से मरने की व्यवस्था करने आया है। लॉकडाउन लगवा कर उसने सबको फुर्सत करवा दी और कह रहा है, लो मरो, अब फुर्सत ही फुर्सत है। पर इस कोरोना काल में मरना कोई नहीं चाहता।
इसके बजाय हर आदमी जिंदा रहने के लिए जुगाड़ लगा रहा है। जुगाड़ इसलिए कि मास्क, सैनिटाइजर, दोनों हमारे देश में जुगाड़ से ही चल रहे है। एन-95 का काम हमारे यहां घर पर बनी मुंहपट्टी और गमछा कर रहा है। सैनिटाइजर का काम शहरों में सर्फ का पानी और गांवों में राख कर रही है।
जो दादी रोज ओटले पर बैठकर मोहल्ले के लोगों को सुनाते हुए कहती थी कि ‘भगवान मुझे उठा ले, भगवान मुझे उठा ले’ वह भी कोरोना के आते ही घर के अंदर घुस गई है। वह चौबीसों घंटे मास्क लगाकर रहती है और दिन-रात घर के दरवाजे की तरफ देखती रहती है।
कोई अपरिचित घर में आए, तो दादी उसे देहरी के भीतर नहीं आने देती। इन दिनों हर अनजान आदमी उसे मौत का दूत लगता है। वह किसी को अपनी खटिया के करीब भी नहीं आने देती। सैनिटाइजर की बोतल अपने सिरहाने ही रखती है और दिन में कम से कम चालीस बार अपने हाथों पर लगाती है।
और अब तो वह यह कहना भी छोड़ चुकी है कि भगवान मुझे उठा ले। वह डरती है कि कोरोना के इस भयावह दौर में अगर भगवान ने सचमुच उसकी सुन ली, तो फिर गजब ही हो जाएगा। दिन-रात काम और पैसे के चक्कर में जो लोग कहते थे कि मरने की फुर्सत नहीं, उनसे अगर यह कहा जाए कि काम सब बंद हो गए और पैसा आना भी बंद है, ऐसे में फुर्सत हो गई, अब मर जाओ, तो हो सकता है कि वे हमारे पीछे हंटर लेकर दौड़ पड़ें।
ऐसे लोग अब भूल से भी यह नहीं कहेंगे कि मरने की फुर्सत नहीं। जब फुर्सत नहीं थी, तब कोई जहर खाकर मरने की तैयारी करता, कोई फांसी लगाकर लटकने की सोचता, कोई रेल पटरी पर सोने का मन बनाता। लेकिन कोरोना ने आकर जबसे लोगों को अपनी चपेट में लेना शुरू किया है, तब से हर कोई मरने के नाम से ही डरने लगा है।
पहले कोई हार्ट अटैक से मरता, कोई सांस रुकने से मरता, कोई छाती में गैस चढ़ने से मरता, कोई गंभीर बीमारी से मरता, पर अब तो हर मरने वाला अपनी मौत का इल्जाम इस कोरोना पर ही लगाकर जा रहा है एक कोरोना ने सारे कारण खत्म कर दिए, व्यस्त और त्रस्त जिंदगी के बीच उसने स्वस्थ जिंदगी जीने का तरीका सीखा दिया।
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनको घर के लोग कहते थे काम का न काज का दुश्मन अनाज का यानी असल जिंदगी में इनके पास कोई काम नहीं होता है, दिन रात केवल आभासी काम यानी टिकटॉक, फेसबुक, और व्हाटसएप के अलावा उनको कुछ सुझता ही नहीं है और दिन-रात ये सोफे और पलंग पर पड़े रहते हैं और इन्हें सुबह उठते ही ताने सुनने पड़ते हैं।
इन्हें कोई काम घर से बाहर का बताओ, तो पड़ोसी के ओटले पर जाकर आधा घंटा वीडियो देखने के बाद काम करके घर आते हैं। वे अब कोरोना के आने के बाद से अपना जीवन बहुत शांति से गुजार रहे हैं। उनको अब न ताने सुनने पड़ रहे हैं और न ही कोई घर से बाहर जाने को बोलता है।
घर के लोग भी सोचते हैं, पड़ा रहने दो, घर से बाहर गया, तो न जाने, कहां से सामान के साथ कोरोना ले आएगा, फिर तो लेने के देने पड़ जाएंगे। ऐसा आदमी बाहर जाकर वैसे भी कोई बड़ा काम नहीं कर सकता, कम से कम घर में रहकर आठ-दस व्हाट्सएप ग्रुप तो चला रहा है।
इसके अंडर में दो-ढाई हजार लोग तो हैं, जो बिना पगार के लोगों को सूचनाएं भेजते हैं और कोरोना के विकट दौर में लोगों का मनोरंजन करते है। ये स्मार्टफोन में घुसकर ही स्मार्ट बन गया, तो अपना भाग्य संवर जाएगा। वैसे भी सरकार ‘वर्क फ्रॉम होम’ पर ही तो जोर दे रही है। बाहर जाकर मौत ले आए, उससे तो अच्छा ही है कि घर में रहे और काम करे, तो साल भर में इसकी लुगाई ला देंगे। बस यह फुर्सत में न रहे। इसे मरने की फुर्सत न मिले, यही कामना है। (लेखक व्यंग्यकार हैं।)