इन दिनों दिल्ली में बोर्ड के इम्तेहान चल रहे हैं। इस हफ्ते अर्थशास्त्र का पेपर था। अंग्रेजी न जानने वाले भी उसे इकोनॉमिक्स के नाम से समझते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ दांत से पकड़-पकड़ कर पैसे खर्च करना। भारत सरकार में वित्तमंत्री प्रधानमंत्री के बाद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इन दिनों इस पद पर अरुण जेटली बैठे हैं।
यूपीए सरकार में दस वर्ष तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह अनुभव के हिसाब से अर्थशास्त्री थे। इसका आशय है कि आदमी और देश के जीवन में इकोनॉमिक्स का बड़ा महत्व है। इस हफ्ते की किताब का नाम है- फ्रीकोनॉमिक्स यानी जुगाड़ू अर्थशास्त्र। इसे स्टीवन डी लेविट और स्टीफन जे डबनर ने मिलकर लिखा है। ये दोनों दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्र विश्लेषक रहे हैं। तीन सौ बीस पृष्ठों की इस किताब को एक महान रचना कहकर सराहा गया है। क्यों?
लेखकों का दावा है कि यह किताब एक चालाक अर्थशास्त्री के पैसों की दुनिया के सभी रहस्यों को उजागर करती है। इसमें अनेक मजेदार रिश्तों को समझाने की कोशिश की गई है। मसलन नशीली दवाओं का धंधा करने वाले अपनी मांओं के साथ क्यो रहना पसंद करते हैं। सेक्स और अपराध, बच्चों को पालना और राजनीति, मोटे आदमी और बेईमानी जैसी विरोधाभासों में गहरा रिश्ता क्यों होता है।
1990 के दशक में अचानक अमेरिका में अपराधों की संख्या अच्छी-खासी बढ़ गयी है। बड़े-बड़े विशेषज्ञों ने इनका कारण जानने का प्रयास किया। क्या पुलिस सख्त हो गई थी? क्या कानून के हाथ लंबे हो गए थे? नहीं, उस दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत हो गई थी, लेकिन भारत में इसका ठीक उलटा हो रहा है।
पृष्ठ 64 पर एक भारतीय वैंकटेश के साथ हुई घटना इस पुस्तक के भावार्थ को स्पष्ट करती है। वह अपने दफ्तर के काम से लेक मिशीगन नाम इलाके में गया। उसे वहां अपार्टमेंट्स में एक सर्वे करना था। जब वह छठी मंजिल पर पहुंचा तो उसने देखा वहां कुछ बच्चे पहल-दूज खेल रहे थे। वह चौंका तब, जब उसे पता लगा कि वे कुछ उपद्रवी किशोर थे।
उसने कहा कि मैं शिकागो विश्वविद्यालय में पढ़ता हूं।
'चुप रहो, हब्शी! तुम हमारी सीढ़ियों में क्या कर रहे हो?
उन दिनों शिकागो में गुंडों के गुट लड़ते-भिड़ते रहते थे। उन लड़कों को समझ में नहीं आया कि वे वैंकटेश का क्या करें?
वो कोई उन जैसा गुंडा तो नहीं था। क्या वह पुलिस का मुखबिर था? न वह सफेद था, न काला। वे आपस में बहस करने लगे। एक बोला इसे मार देते हैं।
भीड़ बढ़ती जा रही थी। एक बोला, चलो अपना सर्वे शुरू करो।
वैंकटेश ने पूछा- आपको अफ्रीकी और गरीब होना कैसा लगता है? अबे गधे, मैं न अफ्रीकी हूं, न अमरीकी। मैं नीग्रो हूं। इस एक वाक्य में एक कड़वी अर्थशास्त्रीय सच्चाई छिपी हुई थी। अफ्रीकी, अमरीकी और नीग्रो की माली हालत अलग-अलग होती है। भारतीय समाज में भी हम अक्सर रेलगाड़ी में साथ बैठे यात्री से रोटी-पानी का रिश्ता बनाने से पहले व्यक्ति की जाति, भाषा, क्षेत्रियता के बारे में सवाल पूछकर उसकी औकात नापने की कोशिश करते हैं।
भारतीय समाज उच्च वर्ग, मध्य-उच्च वर्ग, मध्य वर्ग, निम्न मध्य वर्ग और निम्न वर्गों में बंटा हुआ है। अक्सर हम नौकरी देते समय या शादी-ब्याह तय करते हुए इन पैमानों को आजमाते हैं। 1991 के बाद से भारत ने अपने बाजार, विदेशी मुद्रा निवेश और बाहर के सामानों के लिए यहां तमाम सुविधाएं मुहैया करवा दी हैं। टी.वी. और एफ.एम. रेडियो ने विज्ञापनों की मदद से इसके लिए एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। वे माता-पिता पर हमेशा अपनी जायज-नाजायज चाहतों का दबाव बनाए रखते हैं।
हालांकि बाजार भाव हमारे जीवन में उथल-पुथल मचाए हुए हैं और बच्चों के सपने आकाश छू रहे हैं पर इकोनॉमिक्स स्कूली बच्चों पर हौवा बनी हुई है, खासकर लड़कियों के लिए। यह किताब उस बोझिल विषय को गुदगुदा कर समझाती है।