राष्ट्रपति का अभिभाषण, आर्थिक सर्वेक्षण और बजट ये तीन दस्तावेज हैं और ऐसे अवसर भी, जिनके जरिये सरकार अपनी नीतियां और लक्ष्य बताती है। अन्य चीजों को दरकिनार कर मैंने राष्ट्रपति के अभिभाषण में यह तलाशने की कोशिश की कि सरकार बुरी तरह से नीचे गिर रही अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कौन से कदम उठा रही है। मगर मुझे ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया।
मैंने आर्थिक सर्वेक्षण का रुख किया। इस साल इसके नए कर्णधार हैं, केवी सुब्रमण्यन। आर्थिक सर्वे का एकमात्र चुनौतीपूर्ण अध्याय वह है, जिसमें कहा गया है कि बाजार में सरकार के दखल से मदद मिलने के बजाय नुकसान अधिक होता है, लेकिन अगले दिन वित्त मंत्री ने शाही अंदाज में इस सलाह को नजरअंदाज कर दिया! उन्होंने संरचनात्मक सुझावों से संबंधित अन्य सारी सिफारिशों को भी नजरअंदाज कर दिया।
चलिए अब बजट 2020-21 पर गौर करते हैं। मैं बजट का आकलन-आंकड़ों, भाषण और प्रस्तावों के तीन बिंदुओं के आधार पर करना चाहता हूं- लक्ष्य हासिल करने की क्षमता, अंतर्निहित दर्शन और सुधार।
लक्ष्य को लेकर गलत आकलन
जुलाई, 2019 में पिछला बजट पेश करने के बाद दबाव में कई चीजें की गई थीं, ऐसे में 2019-20 के बजट अनुमानों को लेकर वित्त मंत्री को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं। इसके बावजूद यह दर्ज किया जाना चाहिए कि वह कई बिंदुओं में नाकाम हुईं।
- जीडीपी की 12 फीसदी की विकास दर (नॉमिनल) के अनुमान के विपरीत 2019-20 में जीडीपी 8.5 फीसदी दर से बढ़ेगी। 2020-21 के लिए दस फीसदी का अनुमान है।
- बजट अनुमान के मुताबिक राजकोषीय घाटा 3.3 फीसदी होना चाहिए था, लेकिन 2019-20 में यह 3.8 फीसदी रहा और 2020-21 में इसके 3.5 फीसदी रहने का अनुमान है।
- सकल राजस्व संग्रह के 16,49,582 करोड़ रुपये के अनुमान के विपरीत सरकार मार्च, 2020 के अंत तक सिर्फ 15,04,587 करोड़ रुपये का कर संग्रह कर पाएगी।
- 1,05,000 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के विपरीत इस वित्त वर्ष में इस कवायद से सिर्फ 65,000 करोड़ रुपये जुटाए जाएंगे।
- सरकार ने 2019-20 में कुल 27,86,349 करोड़ रुपये खर्च करने का इरादा जताया था, इसके विपरीत वह सिर्फ 26,98,552 करोड़ रुपये खर्च करेगी, बावजूद 63,083 करोड़ की अतिरिक्त उधारी के।
कोई अंतर्निहित दर्शन नहीं
बुनियादी तौर पर भाजपा सरकार का मार्गदर्शक सिद्धांत आत्मनिर्भरता, संरक्षणवाद, नियंत्रण, कारोबारियों की तरफदारी (उत्पादकों और उपभोक्ताओं के विपरीत), आक्रामक कराधान और सरकारी खर्च पर भरोसे में निहित है। क्या 2020-21 के बजट ने सरकार की सोच में किसी तरह के बदलाव का संकेत किया? इसका जवाब है, ‘नहीं’।
वास्तव में वित्त मंत्री ने इस बारे में कुछ भी नहीं बताया कि देश आज जिस समष्टि आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, उसके बारे में उनकी सरकार क्या सोचती है। न ही उन्होंने यह बताया कि सुस्ती के लिए उनकी सरकार संरचनात्मक कारकों को कारण मानती है या चक्रीय कारकों को। सरकार मांग के संकट और निवेश की कमी की चुनौतियों से निपटने के लिए गंभीर और उद्देश्यपूर्ण समाधान की ओर नहीं देख पा रही है।
सुधार के नाम पर कुछ महीने पहले कॉर्पोरेट सेक्टर पर मेहरबानी की गई थी। बजट में व्यक्तिगत करदाताओं को 40,000 करोड़ रुपये की राहत दी गई है। वित्त मंत्री ने कॉर्पोरेट्स के दबाव में डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स भी हटा दिया है। लेकिन डीडीटी सक्षम कर था और उसने लाभांश से होने वाली आय से संबंधित सारी कर चोरी रोक दी थी। मोलभाव करते हुए वित्त मंत्री ने दो कर व्यवस्थाएं सामने रखी हैं (जिसमें से एक में छूट है और दूसरी में छूट नहीं है) और व्यक्तिगत कर ढांचे को कई तरह की दरों के साथ जटिल बना दिया है। जीएसटी प्रस्तुत करते समय सरकार ने ठीक ऐसी ही गलती की थी।
सुधारों को छोड़ दिया
वित्त मंत्री ने तीन थीम रखी हैं और इनमें से प्रत्येक थीम में कई उपखंड और कार्यक्रम हैं। उदाहरण के लिए एस्पिरेशनल इंडिया (आकांक्षी भारत) की थीम में उन्होंने तीन खंडों की पहचान की है और उसमें से प्रत्येक खंड में उन्होंने कई सारे कार्यक्रमों की घोषणा की है। इसी तरह से उन्होंने दो अन्य थीमों इकोनॉमिक डेवलपमेंट ऑफ ऑल (सबका आर्थिक विकास) और केयरिंग सोसायटी (देखभाव करने वाला समाज) को विस्तार से समझाने में एक घंटा खर्च कर दिया। उन्होंने जब अपनी बात खत्म की तो मैं थीम, खंडों और कार्यक्रमों की संख्या भूल गया। भाषण सुनने और बाद में पढ़ने पर मुझे ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिससे किसी भी सेक्टर में ढांचागत सुधार होगा। हैरत है, आखिर मुख्य आर्थिक सलाहकार के परिश्रम का क्या होगा।
मैं, वित्त मंत्री ने सपाट चेहरे के साथ जो दावे किए, उन्हें याद कर रहा हूं-
1. हमने 2014-2019 के दौरान 27.1 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा।
2. हम 2022 तक किसानों की आय दोगुना कर देंगे।
3. स्वच्छ भारत को महान सफलता मिली और देश अब खुले में शौच से मुक्त हो गया है।
4. हमने हर घर तक बिजली पहुंचा दी है।
5. हम भारत की अर्थव्यवस्था को 2024 तक 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदल देंगे (हालांकि आर्थिक सर्वे ने धकेल कर समय सीमा 2025 कर दी है)
बजट भाषण और बजट के आंकड़ों का हासिल यह है कि भाजपा ने अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने या विकास दर को तेज करने या निजी निवेश को बढ़ावा देने या क्षमता बढ़ाने या नौकरियों का सृजन करने या फिर वैश्विक कारोबार से बड़ा हिस्सा हासिल करने का इरादा छोड़ दिया है। सो, आप 2020-21 में नाकाफी विकास दर से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था के लिए तैयार हो जाइये। मैं जानता हूं कि आप इससे बेहतर के हकदार हैं, लेकिन मुझे भय है कि आपको यही हासिल हुआ।
(लेखक पूर्व में वित्त मंत्री रहे हैं।)