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पड़ोसियों के आगे बेबस

Fri, 30 Aug 2013 08:17 PM IST
रहीस सिंह
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इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने के साथ ही दुनिया तमाम जटिल संघर्षों और आयामों से जुड़ गई, जिन्हें समझना खासकर उन देशों के लिए बहुत जरूरी था, जो वैश्विक नेतृत्व का सपना देख रहे हैं। इस सदी के पहले दशक में ही नई आवश्यकताओं ने भू-सामरिक समीकरणों को बदला और बाजारवादी ताकतों ने मनोवैज्ञानिक धरातल को बदला, जिससे एक तरफ सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन हुआ, दूसरी तरफ राष्ट्रों के चरित्रों और रणनीतियों में। इन्हीं बदलावों ने नई विश्व व्यवस्था का एक खाका खींचा और फिर बहस शुरू हुई कि इस भावी विश्व व्यवस्था का नेतृत्व कौन करेगा। इन सवालों के जवाब खोजने के क्रम में चीन और भारत जैसी उभरती ताकतें सामने आईं। इसमें संशय नहीं चीन कई मामलों में बेहतर है और अपने राष्ट्र की रक्षा तथा वैश्विक ताकतों के लिए एक सीमा रेखा खींचने में सक्षम है। लेकिन इस बहस में भारत कहां है?
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पिछले करीब साढ़े छह दशक में देश ने आर्थिक मोर्चे पर ठीक-ठाक प्रगति की है। तुलनात्मक रूप से चीन ने भारत से अधिक प्रगति की, तमाम दक्षिण-पूर्व एशियाई देश भी भारत से आगे रहे। इसी दौर में ब्राजील जैसे लैटिन अमेरिकी देश भी हमसे आगे निकल गए। दरअसल भारत की विदेश नीति उसके हैसियत के अनुरूप नहीं है। भारत शुरू से ही चाणक्य के कूटनीतिक सिद्धांतों पर नहीं चला, जिनका मानना था कि जरूरत पड़ने पर सत्ता को साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और उद्देश्यों की सिद्धि हेतु षड्यंत्र तथा दांव-पेचों का सहारा लिया जा सकता है। इसके बजाय हम विदुर और कृष्ण के कूटनीतिक फॉर्मूले पर चले, जो यह मानते थे कि कूटनीतिक संबंध तर्क तथा समझौते से नियंत्रित होने चाहिए, और जब तक जरूरी न हो, बल प्रयोग नहीं करना चाहिए।

हमारे कूटनीतिज्ञ पुराना कुछ न तो याद रखने में समर्थ हैं और न सीख पाने में। कूटनीतिक क्षमता में कमी के कारण ही देश के सीमांत इलाकों में विवाद सामने आते हैं। यही नहीं, हमारे अधिकांश पड़ोसी चीन और पाकिस्तान की कठपुतली बनते जा रहे हैं। म्यांमार का उदाहरण ताजा है। सवाल है कि ऐसी उदासीनता क्यों है। आज हमारे नीति-नियंताओं के पास इसका सही उत्तर देने की शक्ति भी नहीं है। वस्तुतः आजादी के ठीक बाद जो दबाव राष्ट्रीय दृढ़ीकरण और भौगोलिक अखंडता के समक्ष उपजे थे, उनका समुचित जवाब देना जरूरी था, अन्यथा राष्ट्रीय अखंडता के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाता। लेकिन नेहरू का विदेश नीति के प्रति दृष्टिकोण आदर्शवादी था, जो कुछ दृष्टिकोणों से तो ठीक था, पर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बिल्कुल नहीं। हालांकि सरदार पटेल के साथ मिलकर नेहरू विदेश नीति को स्थिरता तथा एकता की आधारशिला प्रदान कर रहे थे। लेकिन जैसे ही यह सामंजस्य कमजोर हुआ, हमारी विदेश नीति कमजोर होती गई। पटेल अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने न केवल सत्ता के अर्थ को समझा था, बल्कि भारत के जटिल समाज की मजबूती और राजनीतिक एकता की संभावनाओं को देखते हुए सत्ता के समीकरणों के निहितार्थ को अच्छी तरह से पहचान लिया था। लेकिन आज न तो नेहरू की तरह समझ है, न ही पटेल की तरह दूरदृष्टि।
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विदेशी नीति के मोर्चे पर कमजोरी का सुबूत ईरान या मध्य-पूर्व के कूटनीतिक मामलों में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत अचानक जिस तरह सक्रिय हो रहा है, वह भारतीय दूरदृष्टि के कारण कम और अमेरिकी जरूरतों के कारण अधिक है। दरअसल अमेरिका एशिया-प्रशांत में अमेरिका-जापान-आस्ट्रेलिया त्रिकोण में भारत को शामिल कर एक ऐसे चतुर्भज की रचना करना चाहता है, जो चीन की ताकत का रोक सके। यही नहीं, भारत न तो चीन-पाकिस्तान के गठजोड़ को तोड़ पा रहा है, न ही अमेरिका-चीन घृणा-प्रेम को अपने रणनीतिक लाभ में परिवर्तित कर पा रहा है। हमारे अधिकांश पड़ोसी देशों में चीन की घुसपैठ है और वह लगातार हमें घेरने की कोशिश में है। श्रीलंका और नेपाल जैसे देश हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि दूरदृष्टि और दीर्घावधि योजना के बगैर यह होगा कैसे!
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