फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ऐसे नहीं टलेगा यह संकट

Fri, 30 Aug 2013 08:13 PM IST
सीताराम येचुरी
विज्ञापन
विज्ञापन
रुपया लुढ़कते हुए पाताल में जा लगा है। इससे भी बुरा यह कि यह गिरावट अब भी थमती नजर नहीं आ रही। इस बीच आर्थिक सुधार के पैरोकारों ने यह प्रचार करना शुरू कर दिया है कि रुपये के मूल्य में इस नाटकीय गिरावट का फौरी कारण लोकसभा का खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित करना है। कॉरपोरेट भारत और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंडे के ढिंढोरचियों ने ऐलान कर दिया है कि इस विधेयक ने सार्वजनिक वित्त व्यवस्था पर घातक प्रहार किया है। इस विधेयक के खिलाफ लाल झंडी दिखाते हुए सीआईआई के अध्यक्ष ने कहा हैः इस मुकाम पर इस तरह के विशाल आवंटन (खाद्य सुरक्षा) का राजकोषीय घाटे पर नकारात्मक असर पड़ेगा। बताया जा रहा है कि राजकोषीय घाटा बढ़ने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भयभीत कर दिया है। वे भारतीय बाजार से भाग रहे हैं, जिस कारण रुपया लुढ़क रहा है। देश के नव उदारवादी सुधारवादियों ने इस सच्चाई की अनदेखी कर दी है कि विकासशील दुनिया की अनेक अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में तेजी से गिरावट आ रही है। इस साल की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपये में करीब 20 फीसद गिरावट आई है। लेकिन दक्षिण अफ्रीकी रैंड तो इस दौरान करीब 23 फीसद गिरा है। जाहिर है कि रुपये में गिरावट के लिए खाद्य सुरक्षा विधेयक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
विज्ञापन


अपना मुनाफा अधिकतम करने के मौकों को बनाए रखने की चिंता में कॉरपोरेट भारत मानो एक अमानवीय नारा लगा रहा है कि यह देश अपने गरीबों का पेट भरने की बात कैसे सोच सकता है! खाद्य सुरक्षा विधेयक में जो अपर्याप्त हकदारी दी गई है, उस पर सरकारी खजाने का सिर्फ 30,000 करोड़ रुपये सालाना अतिरिक्त खर्च होने जा रहा है। पर कॉरपोरेट भारत के हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था इतना बोझ उठा नहीं सकती। आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाने के नाम पर कॉरपोरेट भारत को हजारों करोड़ रुपये के जो पैकेज दिए जाते रहे हैं, उसका कोई जिक्र नहीं है। बजट दस्तावेजों के मुताबिक, सरकार द्वारा पिछले तीन साल से हर वर्ष पांच लाख करोड़ रुपये का कर त्याग किया जा रहा है। इनके बावजूद, औद्योगिक उत्पादन का हाल बुरा है। पर कोई यह नहीं कहता कि अमीरों को दी जाने वाली इन सब्सिडियों को अगर बंद नहीं, तो घटा क्यों न दिया जाए।

जबकि गरीबों को दी जाने वाली मामूली सब्सिडियों पर शोर मचाया जाता है। वस्तुतः ईंधन सब्सिडी के बढ़ते बिल के नाम पर सरकार पेट्रो उत्पादों की कीमत में बढ़ोतरी के एक और चक्र की तैयारी कर रही है। ऐसे कदम खाद्य सुरक्षा विधेयक के जरिये लोगों को मिलने वाले थोड़े-बहुत लाभ पर भी पानी फेर देंगे। ऊंची मुद्रास्फीति और जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमत जनता की क्रय शक्ति और सिकोड़ने का ही काम करेगी। पहले ही ऐसे आंकड़े आ चुके हैं कि अर्थव्यवस्था में कुल उपभोग व्यय, जो कुछ वर्षों से आठ फीसदी की संतोषजनक दर से बढ़ रहा था, गिरकर 4.4 प्रतिशत रह गया है।
विज्ञापन


कॉरपोरेट रिपोर्टें दिखाती हैं कि टिकाऊ उपभोक्ता सामान तथा अन्य मालों की बिक्री में 2012 के शुरू से लगातार उल्लेखनीय गिरावट आई है। यूनिलिवर की रिपोर्ट के अनुसार, लोग खर्चों में कटौती कर रहे हैं। पिछले वित्त वर्ष में मोटरकारों की बिक्री में 6.7 फीसद की गिरावट आई थी। इसी तरह वाशिंग मशीन, टेलीविजन, माइक्रोवेव ओवन आदि अन्य टिकाऊ उपभोक्ता सामान की बिक्री में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है। इसकी वजह यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था में सकल घरेलू मांग सिकुड़ रही है। नतीजतन अमीर और कॉरपोरेट खिलाड़ी अपनी बचतों का उत्पादक कामों में निवेश करने से बच रहे हैं, क्योंकि इन निवेशों से जो अतिरिक्त उत्पाद आएगा, उसे आर्थिक संकट के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचा नहीं जा सकता है और देसी बाजार में भी उसके खरीदार नहीं मिलेंगे। पिछले एक साल में तमाम कोशिशों के बावजूद प्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को इसके लिए राजी कर नहीं पाए हैं कि उनके हाथों में जो नकदी जमा हो रही है, उसका निवेश कर दें।

ऐसे में अमीरों को निवेश के विकल्प चाहिए। इसके लिए वे सोना, अचल संपत्ति और विदेशी मुद्राओं में पैसा लगा रहे हैं। सोने-चांदी की कीमत आसमान पर है। अपने यहां अचल संपत्ति की कीमतें सबसे तेजी से बढ़ रही हैं। इसी प्रकार रुपये की कीमत में भारी गिरावट की वजह अमेरिकी डॉलर तथा अन्य मुद्राओं की तेजी से बढ़ती मांग से जुड़ी हुई है। अमेरिका में पैकेजों से हाथ खींचे जाने की खबर को लेकर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में दहशत-सी फैली रही है। सीरिया के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व में हमले की आशंका की पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल के दाम को लेकर भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है। इन सबका असर अपने यहां के शेयर बाजार पर पड़ा है और रुपया लुढ़कता ही जा रहा है। इन अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं के चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों ने तेजी से भारतीय बाजारों से पांव पीछे खींचे हैं।

जाहिर है कि इसका समाधान आर्थिक सुधारों से नहीं मिलेगा। इसका हल इसी में निहित है कि संपन्नों को सब्सिडी देना बंद किया जाए और इन संसाधनों का उपयोग सार्वजनिक निवेशों में बढ़ोतरी के लिए किया जाए, ताकि ढांचागत सुविधाओं का निर्माण किया जा सके। इससे रोजगार के साथ सकल घरेलू मांग भी बढ़ेगी और विनिर्माण व उद्योग के विकास को गति मिलेगी।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें