कुछ समय पहले तक भारत और विदेश में राष्ट्रीय चुनावों में राजनीतिक दलों की किस्मत तय करने में विदेश नीति और राष्ट्रवाद की बहुत मामूली भूमिका होती थी। लेकिन अब बड़े पैमाने पर इसमें बदलाव आ रहा है। अगर इन दोनों कारकों से मात्र दो-तीन फीसदी वोट इधर से उधर होते हैं, तो सीटों की संख्या में भारी अंतर आ सकता है और यह तय हो सकता है कि सरकार किसकी बनेगी।
भले ही 1960 और 70 के दशक में कथित सीआईए का हाथ और कम्युनिस्ट विरोधी डर ने सीमित रूप से उम्मीदवारों के पक्ष या विपक्ष में मतदाताओं को प्रभावित किया हो, लेकिन यह आर्थिक स्थिति ही थी, जो पार्टियों की सफलता के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई। एक बार तो दिल्ली की राज्य सरकार प्याज के दाम बढ़ने के कारण चुनाव हार गई थी!
जबकि 2014 में यूपीए-2 की हार के कई कारक थे- नीतिगत अपंगता, बढ़ता भ्रष्टाचार, घोटालों की शृंखला, सीएजी की रिपोर्ट, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, मूल्य वृद्धि आदि, लेकिन विदेश नीति की विफलता उनमें शामिल नहीं थी। हालांकि मुंबई हमला (26/11) यूपीए-2 के शासन में ही हुआ था, पर किसी ने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडल के राष्ट्रवाद पर सवाल नहीं उठाया।
अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 के बाद वहां के सुप्रीम कमांडर यानी राष्ट्रपति की क्षमता में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा व सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना एक प्रमुख कारक बन गया है। कुछ हद तक इसने जॉर्ज डब्ल्यू बुश को दूसरा कार्यकाल दिलाने में भी मदद की। विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इराक, लीबिया और सीरिया के हालात से जूझ रही थीं। उन्होंने सैकड़ों ईमेल अपने व्यक्तिगत आईडी से भेजे थे, जो 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के काम आए, जिसके आधार पर उन्होंने उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाए, जिसने मतदाताओं को प्रभावित किया और हिलेरी की चुनावी संभावनाओं पर दाग लगाया।