किसानों के मौजूदा आंदोलन ने कई मुद्दों पर देश का ध्यान आकृष्ट किया है। एक तरफ जहां परामर्शी कानून बनाना, कृषि मूल्य शृंखला, कृषि उत्पादन तथा खाद्य सुरक्षा के बीच लंबी संकीर्ण सड़क है, तो दूसरी ओर कृषि एवं पोषण के बीच महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिन पर बहस की जरूरत है। हमारा संविधान जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के साथ-साथ अपने नागरिकों को पर्याप्त आजीविका सुनिश्चित करने के साथ उनके पोषण की स्थिति और जीवन स्तर को सुधारने के लिए सरकार को बाध्य करता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का मत है कि समग्रता में देखें, तो ये प्रावधान भोजन के मूलभूत अधिकार को भी समाहित करता है। अगर ऐसा है, तो हमारी आबादी के कितने हिस्से को यह अधिकार पूरी तरह हासिल होना बाकी है? इस प्रश्न में कई अन्य प्रश्न शामिल हैं।
क्या हम यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त उत्पादन कर रहे हैं कि एक राष्ट्र के रूप में हम बुनियादी और स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के उत्पादन में आत्मनिर्भर हैं? क्या हम सभी खाद्य समूहों को अच्छी तरह वितरित कर रहे हैं कि यह सुनिश्चित कर सकें कि हमारे नागरिकों में से कुछेक ही पोषण के मामले में पीछे रह गए हैं? कुछ बड़े सवाल भी हैं। क्या हमारी कृषि नीतियां और लागत जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन और औद्योगिकीकरण व शहरीकरण के दबाव से आगामी पानी की कमी को पर्याप्त रूप से संबोधित करती हैं? क्या हमारी कृषि अनुसंधान प्राथमिकताओं को उत्पादकता बढ़ाने और किसान भागीदारी के साथ अगली कृषि क्रांति लाने के लिए जोड़ा गया है? इन सवालों के किसी भी उत्तर के केंद्र में किसान हैं, जो सहस्राब्दी लंबे पारंपरिक ज्ञान के उत्तराधिकारी हैं और मौजूदा वाणिज्यिक और वित्तीय व्यवस्था के अधीन हैं।
उत्पादकों के रूप में वे हर कृषि नीति के प्रभावों को झेलते हैं और हमें नहीं भूलना चाहिए कि उपभोक्ताओं के सबसे बड़े समूह के रूप में वे खाद्य एवं पोषण सुरक्षा नीति के सबसे अंत में आते हैं। सवालों और सुझावों के साथ यहां इन्हीं मुद्दों पर बात करने की कोशिश होगी। समेकित रूप से भारत का खाद्यान्न भंडार इस जून में 4.1 करोड़ टन के बफर स्टॉक के मुकाबले करीब दस करोड़ टन था। साफ है कि किसानों ने भारी उत्पादन किया और खाद्यान्न की कमी को दूर किया, जिससे अकाल का भूत सुदूर अतीत की बात हो गई। कई वर्षों से बरकरार यह शानदार प्रदर्शन न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का प्रोत्साहन के रूप में सत्यापन करता है। एमएसपी एक ऐसा प्रोत्साहन है, जिसके लिए आज किसान आंदोलन कर रहे हैं। वितरण पक्ष को देखें, तो वैश्विक खाद्य सुरक्षा और पोषण पर संयुक्त राष्ट्र की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में खाद्यान्न उपलब्धता की दृष्टि से असुरक्षित लोगों की सबसे ज्यादा आबादी है। यही नहीं, मध्यम एवं गंभीर खाद्य असुरक्षा वाले भारतीयों की संख्या वर्ष 2014-16 के 42.65 करोड़ से 6.2 करोड़ बढ़कर 2017-19 में 48.86 करोड़ हो गई। कम खाद्य असुरक्षा के मामलों की भी गणना की जाए, तो स्थिति और भी खराब हो सकती है, जिन्हें कोई भी सामाजिक-आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी झटका गंभीर खाद्य असुरक्षा के दायरे में धकेल सकता है।
विश्व बैंक के अनुसार, खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं में कोविड से संबंधित व्यवधान, आय में कमी और विदेशों से भेजे जाने वाले धन में गिरावट के कारण खाद्य सुरक्षा में और अधिक कमी आने की आशंका है। हालांकि कृषि दो तिहाई लोगों को रोजगार देती है, लेकिन केंद्रीय बजट में कृषि में सार्वजनिक निवेश करीब पांच फीसदी है। कम उपयोग कम आवंटन को बढ़ाता है। कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग और कृषि अनुसंधान व शिक्षा विभाग ने पिछले सात-आठ वर्षों में अपने बजट का पांच से 25 फीसदी तक कम उपयोग किया है। ऐसे हास्यास्पद व्यय के साथ राष्ट्र शायद ही भविष्य में बेहतरी की उम्मीद कर सके। विश्व बैंक और नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (एनएएएस), दोनों का मानना है कि छोटे और सीमांत किसानों की उत्पादकता बढ़ाना, जिनमें 85 फीसदी किसान शामिल हैं, विकास, गरीबी में कमी, समानता और कुपोषण को संबोधित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
कृषि में निजी निवेश की स्थिति बेहतर नहीं है, जिससे कृषि में कुल निवेश का प्रतिशत घट गया है। वांछित और वास्तविक निजी निवेश के बीच अंतराल बढ़ रहा है। किसानों की आय दोगुनी करने के लिए गठित समिति के अनुसार, कृषि में निजी निवेश को 2015-16 के 61,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2022-23 तक 1,39,424 करोड़ रुपये किया जाना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जो भी नीतियां बनाई गई हैं, उसे स्थानीय छोटे एवं मंझोले कृषि-व्यवसायियों को बड़े व्यवसायियों की तरह समान अवसर, कृषि विविधता को प्रोत्साहन, पर्याप्त प्रतिस्पर्धा एवं नवाचार के लिए प्रोत्साहन सुनिश्चित करना चाहिए। केवल बड़े व्यवसाय को सशक्त बनाने से कृषि आय में सुधार, राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा या कृषि में सकल मूल्य वर्धन संभव नहीं है, जो कि केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के अनुसार 2013-14 से लगातार घटती चली गई है। कृषि अनुसंधान बजट इस संबंध में उत्साहजनक नहीं है। हमें इसे कम से कम तीन गुना बढ़ाने की आवश्यकता है।
वैश्विक स्तर पर गरीबी को घटाने के लिए मान्य मनरेगा को आधे-अधूरे मन से समर्थन देकर वर्तमान सरकार ने हमारी ग्रामीण आबादी की खाद्य सुरक्षा से समझौता किया है। एमएसपी पर खतरा मंडराने के साथ किसान दोहरे दबाव का शिकार हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र भी भारत में ग्रामीण केंद्रों द्वारा खरीद, कृषि इनपुट और उपकरणों के प्रावधान और कर्ज तक पहुंच की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करता है। स्थापित संस्थानों को आधुनिक, ज्यादा कुशल और जवाबदेह बनाया जा सकता है और रोजगार के नुकसान एवं स्थापित संबंधों के समग्र व्यवधान के बिना बाजार तंत्र के अधीन किया जा सकता है। यह विडंबना ही होगी, अगर कानून कृषि बाजारों के प्रशासनिक और वाणिज्यिक मुक्ति का दावा करता है, जिससे धन संग्रहण बढ़ता है, विषमताएं बढ़ती हैं और किसानों को ठीक उस समय हर तरह की सौदेबाजी करने से वंचित किया जाता है, जब उन्हें समर्थन और मजबूती की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।