कर्नाटक के कोलार में विस्ट्रान कंपनी के आईफोन बनाने वाली फैक्टरी में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं बताती हैं कि केंद्र को राज्यों में व्यवस्थागत गड़बड़ियों की ओर ध्यान देने की जरूरत है। कठोर तथ्य यह है कि आप एंबेसेडर कार चलाकर फार्मूला वन रेस नहीं जीत सकते हैं। राज्य स्तर पर क्षमता और शासन के बीच की खाई केंद्र में परिकल्पित विचार की मंशा को रोकती है एवं पटरी से उतारने का जोखिम पैदा करती है। वर्षों से भारत सरकार ने सस्ते श्रम का लाभ दिखाकर प्रतिष्ठित उत्पादों के निर्माताओं को 'मेक इन इंडिया' की खातिर लुभाने के लिए राजनीतिक पूंजी का निवेश किया है।
चीन में बढ़ती मजदूरी ने भारत के लिए एक अवसर पैदा किया है कि वह वियतनाम, थाईलैंड और मैक्सिको का रुख करने वाले निवेशकों को लुभाए। महामारी के बाद इसमें तेजी आई है, क्योंकि कई देशों ने विनिर्माण की आपूर्ति शृंखला को चीन से दूर पुनर्गठित किया है। मोदी सरकार द्वारा उत्पादकता से जुड़ी प्रोत्साहन योजना की व्यवस्था ने इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के वैश्विक उत्पादकों के लिए भारत में अपना व्यवसाय शुरू करने का अवसर पैदा किया है। सरकार ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, विशेषकर ग्लोबल मार्ट्स के लिए भारत में स्मार्ट फोन की इकाइयों के प्रोत्साहन के लिए कर में छूट का प्रावधान किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल में इसकी अधिसूचना जारी होने के बाद से वैश्विक अनुबंध दिग्गज सहित 22 कंपनियों को मंजूरी दी गई है।
विस्ट्रॉन ने अगस्त में अपना परिचालन शुरू किया और ताइवान के दो अन्य अनुबंध निर्माताओं-फॉक्सकॉन और पेगाट्रॉन ने सेल फोन एसेंब्लिंग प्लांट के लिए हस्ताक्षर किए हैं तथा अगले कुछ वर्षों में करीब 90 करोड़ डॉलर के निवेश का वादा किया है। आप सोचते होंगे कि कर्नाटक की सरकार ने परिचालन प्रक्रिया से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए यथोचित प्रयास किया होगा , विशेष रूप से इस तथ्य के आलोक में कि विस्ट्रॉन संयंत्र एक प्रतिष्ठित उत्पाद 'एपल आईफोन' जैसे वैश्विक ब्रांड से जुड़ा है, यह एक ऐसा ब्रांड है, जिसके बारे में गूगल पर सर्च करने पर चालीस लाख परिणाम सामने आते हैं। हालांकि ऐसा नहीं था। संपत्ति के विनाश और 150 से अधिक गिरफ्तारियों ने व्यवस्थागत उदासीनता के स्तर को उजागर किया है।
इस घटना के मूल में कर्मचारियों के वेतन का भुगतान नहीं करना है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें कई महीनों से वेतन नहीं दिया जा रहा था। लेकिन कंपनी ने दावा किया कि सभी भुगतान अस्थायी-कर्मचारी उपलब्ध कराने वाली कंपनियों को किए गए थे, जो कर्मचारियों को अनुबंध पर रखते थे। कर्नाटक के श्रम विभाग की जांच और एपल के दबाव के बाद अब इस बात का खुलासा हुआ है कि कर्मचारियों को वास्तव में वेतन का भुगतान नहीं हुआ है। बहस का विषय यह है कि क्या श्रमिकों के अधिकारों का संरक्षण करने और ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए कोई व्यवस्था उपलब्ध है। अस्थायी कर्मचारी उपलब्ध कराने वाली कंपनियों के जरिये कर्मचारियों को काम पर रखना भारत के औद्योगिक केंद्रों और विशेष रूप से कर्नाटक में कोई नई बात नहीं है। सवाल यह है कि क्या निवारण का कोई तंत्र मौजूद है। क्या सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि अस्थायी कर्मचारी उपलब्ध कराने वाली कंपनियों ने ऐसे किसी तंत्र के अस्तित्व के बारे में श्रमिकों को सूचित/शिक्षित किया है? निश्चित रूप से, ऐसा करने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर सर्वोत्तम प्रथाएं उपलब्ध हैं।
कर्नाटक में नियमों, विनियमन और निवारण तंत्र के बीच खाई कोई अनोखी बात नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में 100 अरब डॉलर टर्नओवर के लक्ष्य के साथ उत्पादकता से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना में 16 से अधिक निर्माताओं ने हस्ताक्षर किए हैं और इसका उद्देश्य रोजगार सृजन को बढ़ावा देना है। विवाद की आशंका कानूनों और विनियमों को लागू करने के बीच की खाई पर निर्भर है। उत्तर प्रदेश का नोएडा इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का केंद्र है, जहां पांच पीएलआई इकाई हैं, जिसमें सैमसंग एवं डिक्सन जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। कोलार की घटना सभी राज्यों में मानदंडों की समीक्षा का आह्वान करती है और यह सभी राज्यों के लिए चेतावनी की घंटी है।
भारत भर में श्रमिक विवाद समाधान का क्षेत्र देरी और क्षय का गंदा परिदृश्य पेश करता है। सितंबर में प्रस्तुत औद्योगिक संबंध संहिता, 2019 पर अपनी रिपोर्ट में, श्रम संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने खुलासा किया कि केंद्र सरकार के 22 औद्योगिक न्यायाधिकरणों में लगभग 23,000 मामले लंबित हैं। और इनमें से छह न्यायाधिकरणों में 2020 की शुरुआत में कोई भी पीठासीन अधिकारी नहीं था। भारत की 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा केवल लाइसेंस राज युग के शासन, कानून, संस्थान और नियामक ढांचे से पूरी नहीं हो सकती है। व्यवसाय मॉडल में प्रौद्योगिकी और संरचनात्मक बदलावों के कारण व्यवधान कानूनों और नियमों के आधुनिकीकरण की मांग करते हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था में किसी भी नीति की स्थिरता राज्य के विनियमन और कार्यान्वयन क्षमता की मजबूती पर निर्भर करती है।
बदलाव का निचोड़ राज्यों में शासन की स्थिति पर निर्भर है। नई वास्तविकताओं का सामना करने की क्षमता बढ़ाने की जरूरत है और इसे कभी इतना जरूरी नहीं समझा गया है। निवासियों की सुस्ती का परिणाम वैश्विक रैंकिंग में दिखता है। पिछले हफ्ते जारी संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट में भारत को 189 देशों में 131वें स्थान पर रखा गया है। समग्र रैंकिंग में भारत अपने सभी ब्रिक्स समकक्षों से पीछे है। मानव विकास का हर माप इस पर निर्भर करता है कि राज्य सरकारें अपनी सेवाओं का वितरण कैसे करती हैं। राज्यों ने शायद ही इसकी जरूरत को दर्शाया है।
एक आकर्षक धारणा है कि केंद्र और राज्यों में तालमेल होने से बदलाव होता है, पर वास्तव में ऐसा भी नहीं हुआ है। पंद्रह राज्यों में सरकार होने के बावजूद भाजपा गुजरात जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई है। हाल ही में पारित कृषि कानूनों के मुद्दे को ही ले लीजिए। जब तक किसानों का आंदोलन दिल्ली नहीं पहुंच गया, तब तक भाजपा शासित राज्यों ने संभावित अवसरों के प्रचार का कोई संकेत नहीं दिया। नीति निर्माण और उसके राजनीतिक आख्यानों के केंद्रीकरण ने एक विकृत परिणाम उत्पन्न किया है। इसने केंद्र को सुर्खियों में ला दिया है, राज्य नेतृत्व को संरक्षणात्मक कवच में बंद कर दिया है और खराब शासन की
जवाबदेही से राज्यों को मुक्त कर दिया है।