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भूख का इलाज है बेहतर निगरानी तंत्र

Wed, 19 Jun 2013 09:39 PM IST
अनुराग दीक्षित
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संप्रग सरकार की बहुप्रतीक्षित खाद्य सुरक्षा विधेयक कानून बनते ही देश की तस्वीर बदल देगा! कुपोषण बीते जमाने की बात होगी! भूख के चलते फिर कोई मौत नहीं होगी! पिछले चार वर्षों से लगभग ऐसा ही सपना दिखाया जाता रहा है, जो अभी तक सच नहीं हो सका है। अब विशेष सत्र में इसे पेश करने की बात कही जा रही है। हालांकि विधेयक को कानून बनाने की दिशा में प्रयास होते जरूर दिखते हैं और करीब हर दल इस मुद्दे पर गंभीर होने जैसा राजनीतिक संदेश देने में लगा रहा है। लेकिन क्या वाकई यही सत्य है?
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समझना होगा कि आजादी के करीब 66 वर्ष बाद भी अगर देश की करीब 66 फीसदी आबादी को कम दाम पर खाद्यान्न की आवश्यकता है, तो इस हालात के पीछे दोषी कौन है? देश की एक तिहाई आबादी को आज तक आत्मनिर्भर न बना पाने का जिम्मेदार आखिर किसे ठहराया जाए? क्यों आज भी रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन के दावे के बीच करोड़ों भारतीयों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है?

औसतन हर आधे घंटे में एक किसान की खुदकुशी के बीच भूख से होने वाली मौत का आंकड़ा सरकार के पास क्यों नहीं है? समझा जा सकता है कि जब अन्न पैदा करने वालों के ये हालात हैं, तो आम इंसान का क्या होगा? ऐसे में हमारा राजनीतिक वर्ग क्या सच में भुखमरी खत्म करने को प्राथमिकता में रखता है? खासकर तब, जबकि मौजूदा लोकसभा में 300 से ज्यादा सांसद और राज्य विधायिकाओं में भी सैकड़ों ‘माननीय’ करोड़पति हों।
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वैसे कुछ अहम प्रावधानों के साथ देश के बड़े हिस्से को सस्ते दाम पर अनाज का कानूनी हक देना यकीनन एक बड़ी उपलब्धि होगी। हालांकि ऐसी योजनाएं पहले से वजूद में हैं। मसलन, कुपोषण दूर करने के लिए 70 के दशक में शुरू की गई समेकित बाल विकास सेवाओं (आईसीडीएस) के 40 वर्षों के बाद भी दुनिया का हर तीन में एक कुपोषित बच्चा भारत में है। इस युवा भारत में हर 20 सेकंड में एक मासूम की मौत हो रही है।

इसके अलावा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम), मध्याह्न खाद्यान्न योजना, सबला जैसी ढेरों योजनाएं करोड़ों रुपये के आवंटन के साथ कागजों पर मौजूद हैं, लेकिन अफसोस है कि उम्मीद के मुताबिक नतीजे आज तक नहीं मिल सके हैं। उधर गरीबी, कुपोषण और भूख से निपटने के लिए बनी ढेरों योजनाओं का राजनीतिक फायदा तो उठाया जाता रहा है, लेकिन योजनाएं कैसे बेहतर तरह से काम करें, इस पर शायद ही कभी ईमानदारी से सोचा गया है! अधिकांश योजनाएं निगरानी तंत्र की विफलता या साठगांठ के चलते भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही हैं।

ऐसे में क्या इस नए कानून के बाद सब कुछ सुधर जाने की गांरटी होगी? जाहिर है, पहले मौजूदा निगरानी तंत्र को सुधारने के लिए संघीय ढांचे को नए सिरे से समझने की सख्त जरूरत है, ताकि लाखों करोड़ों का आवंटन सही हाथों में जा सके।

हालांकि सवाल सरकारों की चिंता का भी है। मसलन ‘सड़ने से बेहतर गरीबों में अनाज बांटने’ के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को केंद्र सरकार ने आज तक ध्यान क्यों नहीं दिया? उधर, गुजरात में बीते दस वर्षों से खाद्य सुरक्षा होने के नरेंद्र मोदी के दावे के बावजूद क्यों वहां राष्ट्रीय औसत से ज्यादा कुपोषण है? उत्तर प्रदेश सरकार खाद्य सुरक्षा के दायरे में गांवों का शत-प्रतिशत कवरेज चाहती है, लेकिन क्या दक्षिण की भांति स्वयं राज्य यह नहीं कर सकता? यकीनन यहां दूसरे के पाले में गेंद डालने का ही काम ज्यादा होता रहा है, जो अब भी कायम है।

प्रस्तावित विधेयक में भी सबके घर तक अनाज पंहुचाने से लेकर खाद्य सुरक्षा भत्ता देने तक की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। ऐसे में संघीय ढांचे के तर्क के बीच बुनियादी राजनीतिक सवाल यही है कि जब सब कुछ राज्यों को ही करना है, तो राजनीतिक श्रेय भला केंद्र सरकार क्यों ले? इन सबके बीच क्या हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधार पाए हैं? गरीबों की वास्तविक संख्या जुटा पाए हैं?

क्या आधार नंबर सारी मुसीबतों का हल है? अगर नहीं, तो इस ‘गेम चेंजर’ कानून को लाने में हुई इतनी देरी के बाद अचानक इतनी हड़बड़ी क्यों? ऐसे में राजनीतिक श्रेय लेने के बजाय नीतियों का बेहतर क्रियान्वयन सर्वोपरि होना चाहिए, जो फिलहाल अधिकांश मामलों में प्राथमिकता में नहीं दिखता
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