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जीवन धारा: इधर-उधर के बजाय गंतव्य पर टिकाएं ध्यान, खुद को स्वीकारें

स्वामी सत्यानंद सरस्वती Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 07 Feb 2025 04:33 AM IST

सार

एकाग्रचित्त वालों का सारा ध्यान अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहता है। यह चित्त की ऊंची अवस्था है। यदि पक्षी की आंख का भेदन करना है, तो मन के लेंस को केंद्रित करना होगा, ताकि यह केवल लक्ष्य को देखे।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


आध्यात्मिक यात्रियों की पांच श्रेणियां होती हैं। सबसे पहली श्रेणी में मूढ़ लोग आते हैं, जो भ्रम में खोए हुए हैं और उन तक पहुंचना, उनको जगाना बहुत कठिन है। दूसरी श्रेणी में क्षिप्त चित्त वाले लोग आते हैं, जिनका दिमाग, इच्छाएं, कामनाएं, उद्देश्य, उपलब्धियां, कर्म, अभिव्यक्तियां, व्यक्तित्व, पसंद-नापसंद, रोग-द्वेष सब बिखरे हुए हैं। वे किसी एक विकल्प पर स्थिर नहीं हो पाते। कभी उनको फिल्म स्टार बनना है, तो कभी नेता बनना है। कभी उनको स्वर योग करने का मन करता है, तो कभी कुंडलिनी योग। ऐसे लोगों को बोलते हैं क्षिप्त। उनका मन अस्थिर और चित्त अस्तव्यस्त रहता है। तीसरी श्रेणी के लोग घड़ी के पेंडुलम की तरह डोलते रहते हैं। घड़ी के पेंडुलम का कम से कम एक स्थिर मध्यबिंदु रहता है, जहां वह रुकता है। तुम्हारा मन इधर-उधर भटकता रहता है, फिर तुम प्राणायाम का अभ्यास करते हो। तुम अन्य किसी विषय के बारे में सोचने लगते हो कि अचानक ख्याल आता है, मैं तो प्राणायाम कर रहा था और फिर वापस अभ्यास करने लगते हो। जब मन भटकता है, तो तुम उसे फिर से वापस केंद्र में ला सकते हो।


यह मन की तीसरा श्रेणी है, जिसे विक्षिप्त कहा जाता है। मूढ़, क्षिप्त और विक्षिप्त- ये तीन मन की श्रेणियां हैं, अधिकतर लोग इन्हीं श्रेणियों में आते हैं। चौथी श्रेणी है एकाग्र चित्त वालों की। वे चाहे खाएं, पीएं या जो भी काम करें, उनका सारा ध्यान एक चीज पर केंद्रित रहता है। यह चित्त की बहुत ऊंची अवस्था है। एकाग्रचित्त की एक सुप्रसिद्ध कथा है। एक बार गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे। उन्होंने सबको बारी-बारी से बुलाया और सबसे एक ही प्रश्न किया, ‘तुम्हें सामने वाले वृक्ष पर क्या दिखाई दे रहा है?’ ज्यादातर ने कहा कि मुझे वृक्ष, उनकी शाखाएं, टहनियां, पत्ते और पक्षी दिखाई दे रहे हैं। अंत में अर्जुन ने कहा, मुझे मात्र एक काला बिंदु, पक्षी की आंख दिखाई दे रही है। अगर तुम्हें पक्षी की आंख का भेदन करना है, तो तुम्हें अपने मन के लेंस को केंद्रित करना होगा, ताकि यह केवल लक्ष्य को देखे। पांचवीं अवस्था निरुद्ध चित्त यानी चित्त की नियंत्रित अवस्था है। जैसे आप कार को रोकने के लिए ब्रेक लगाते हैं, उसी प्रकार मन की गति को रोकना निरोध कहलाता है। यह बहुत उच्च अवस्था है।


सूत्र- खुद को स्वीकारें

आत्मनिरीक्षण करने के लिए अपने प्रति ईमानदार बनना होगा। पहले अपने आप को स्वीकार करो, फिर पता लगाओ कि मैं कौन हूं। अपने को जानने के एक नहीं अनेक तरीके हैं। तुम्हें एक आईने की आवश्यकता होगी। तुम्हारा आलोचक तुम्हारा आईना है, क्योंकि वह तुम्हारा सच्चा रूप तुम्हें दिखा देता है।

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