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बाढ़ में डूबी हुई चेतावनियां, बता रहे हैं रोहित कौशिक

रोहित कौशिक
Updated Fri, 21 Aug 2020 05:32 AM IST
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बाढ़ (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला।

इस समय देश के अनेक हिस्से बाढ़ से जूझ रहे हैं। असम, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात के कई इलाके पानी में डूबे हुए है। अनेक जगहों पर बाढ़ जनित हादसों में कई लोगों की जान जा चुकी है।



विडंबना यह है कि एक तरफ कोरोना के कारण जनता भयभीत है, तो दूसरी तरफ बाढ़ ने स्थिति को भयावह बना दिया है। इस कोरोना काल में यदि बाढ़ से निपटने के समुचित उपाय नहीं किए गए, तो अन्य संक्रामक रोगों के साथ-साथ कोरोना का खतरा भी कई गुणा बढ़ सकता है।


यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हमारे देश में कई स्थान ऐसे हैं कि जहां एक ही इलाके को बारी-बारी से सूखे और बाढ़ का सामना करना पड़ता है। विकास की विभिन्न परियोजनाओं के लिए जिस तरह से जंगलों को नष्ट किया गया और पेड़ों की कटाई की गई, उसने स्थिति को और भयावह बना दिया। इस भयावह स्थिति के कारण मानसून तो प्रभावित हुआ ही, भू-क्षरण एवं नदियों द्वारा कटाव किए जाने की प्रवृति भी बढ़ी।


बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं पहले भी आती थीं, लेकिन उनका अपना एक अलग शास्त्र और तंत्र था। इस दौर में मौसम विभाग की भविष्यवाणियों के बावजूद हम बाढ़ का पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं। दरअसल प्रकृति के साथ जिस तरह का सौतेला व्यवहार हम कर रहे हैं, उसी तरह का सौतेला व्यवहार प्रकृति भी हमारे साथ कर रही है।


पिछले कुछ समय से भारत को जिस तरह से सूखे और बाढ़ का सामना करना पड़ा है, वह आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन पर आधारित उस रिपोर्ट का ध्यान दिलाती है, जिसमें जलवायु परिवर्तन के कारण देश को बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं झेलने की चेतावनी दी गई थी। प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा जलवायु परिवर्तन के किस रूप में हमारे सामने होगा, यह नहीं कहा जा सकता है।


जलवायु परिवर्तन का एक ही जगह पर अलग-अलग असर हो सकता है। यही कारण है कि हम बार-बार बाढ़ और सूखे का ऐसा पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं, जिससे कि लोगों के जान-माल की समय रहते पर्याप्त सुरक्षा हो सके।


शहरों और कस्बों में होने वाले जल भराव के लिए काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ वर्षों में कस्बों और शहरों में जो विकास और विस्तार हुआ है, उसमें पानी की समुचित निकासी की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। यही कारण है कि देश के अधिकतर कस्बों और शहरों में थोड़ी बारिश होने पर ही सड़कों पर पानी भर जाता है।
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गौरतलब है कि 1950 में हमारे यहां लगभग ढाई करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी थी, जहां पर बाढ़ आती थी, लेकिन अब लगभग सात करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिस पर बाढ़ आती है। इसकी निकासी का कोई समुचित तरीका भी नहीं है। हमारे देश में केवल चार महीनों के भीतर ही लगभग अस्सी फीसदी पानी गिरता है।


उसका वितरण इतना असमान है कि कुछ इलाके बाढ़ और बाकी इलाके सूखा झेलने को अभिशप्त हैं। इस तरह की भौगोलिक असमानताएं हमें बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं। पानी का सवाल हमारे देश की जैविक आवश्यकता से भी जुड़ा है।


2050 तक हमारे देश की आबादी लगभग एक सौ अस्सी करोड़ होगी। ऐसी स्थिति में पानी के समान वितरण की व्यवस्था किए बगैर हम विकास के किसी भी आयाम के बारे में नहीं सोच सकते हैं। हमें एक तरफ अपने आपदा प्रबंध तंत्र को जागरूक और सक्रिय बनाना होगा, तो दूसरी तरफ अपने पारंपरिक जल स्रोतों पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा।


गौरतलब है कि पूरे देश में बाढ़ से होने वाले नुकसान का लगभग साठ फीसदी नुकसान उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और आंध्र प्रदेश में आई बाढ़ के माध्यम से होता है। बाढ़ पर राष्टीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में बाढ़ के कारण हर साल लगभग एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है।


यह नुकसान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पूरे विश्व में बाढ़ से होने वाली मौतों में पांचवां हिस्सा भारत का है। बाढ़ केवल हमारे देश में कहर नहीं ढा रही है, बल्कि चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं।


हालांकि हमारे देश में सूखे और बाढ़ से पीड़ित लोगों के लिए अनेक घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन मात्र घोषणाओं के सहारे ही पीड़ितों का दर्द कम नहीं होता है। सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि इन घोषणाओं का लाभ वास्तव में पीड़ितों तक पहुंचे।

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