असम के बाद अब बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बाढ़ ने भीषण रूप ले लिया है। उत्तर प्रदेश में बनारस और इलाहाबाद में बाढ़ से बुरा हाल है, तो मध्य प्रदेश में हाल में हुई तेज बारिश से स्थिति भयावह बन गई है। खासकर होशंगाबाद जिले में नर्मदा, तवा और छोटी-बड़ी कई नदियां उफन रही हैं। अक्सर जब बाढ़ आती है, तभी हम जागते हैं और इसे प्राकृतिक आपदा मानकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। जबकि अब बाढ़ हर साल आती है और बड़ा नुकसान करती है।
बाढ़ की एक वजह है अधिक वर्षा। लेकिन बांध भी बाढ़ लाते हैं। जिन बांधों का एक फायदा कभी बाढ़ नियंत्रण गिनाया जाता था, अब वही बाढ़ के कारण बनते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें, तो नर्मदा पर कई बांध बन गए हैं। बरगी बांध, इंदिरा सागर बांध और ओंकारेश्वर बांध से पानी छोड़ने और उसके बैकवाटर के कारण नर्मदा में मिलने वाली नदियों का पानी आगे न जाने के कारण गांवों या खेतों में घुस जाता है। बांधों से बाढ़ नियंत्रण तभी संभव है, जब बांधों को खाली रखा जाए, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए जब बारिश होती है, तब नदी-नाले और बांध भी लबालब होते हैं, जिससे बाढ़ की स्थिति निर्मित होती है।
लोगों का मानना है कि जब से इंदिरा सागर बांध बना है, तब से मध्य प्रदेश के इस इलाके में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। कुछ साल पहले ओडिशा में आई भयानक बाढ़ का कारण भी हीराकुंद बांध से छोड़े गए पानी को बताया गया था। देश में ऐसे कई छोटे-छोटे बांध हैं, जिनसे समय-असमय पानी छोड़ा जाता है, जिसके चलते उन इलाकों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके अलावा नदियों की वह रेत भी अब धड़ल्ले से उठाई जा रही है, जो पानी के बहाव को नियंत्रित करती है। रेत पानी को सोखकर अपने में जज्ब करके रखती है। वह भूगर्भ के जलस्तर को शुद्ध करने का काम भी करती है। वैसे तो नदियां अपना मार्ग बदलती रहती हैं, लेकिन रेत खनन के कारण नदी मार्ग में होता यह बदलाव भयावह होता है। उत्तर प्रदेश में खनन माफिया की अति सक्रियता से नदियों के रास्ता बदलने का खतरा पैदा हो रहा है। नदियों के स्वाभाविक प्रवाह को अवरुद्ध करने, उनके किनारों पर अतिक्रमण करने और जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण भी बाढ़ की स्थिति पैदा होती है। कुछ साल पहले मुंबई में बाढ़ का कारण वहां की मीठी नदी के रास्ते को बदलना और उसके बीचोंबीच व्यावसायिक परिसर का निर्माण करना था।
पहले नदियों के किनारे पेड़-पौधे व हरी घास और परती जमीन पर झाड़ियां होती थीं। उनसे बाढ़ तो नहीं रुकती थी, पर पानी का वेग कम जरूर हो जाता था। अब बाढ़ कहर ढाती है। इसका एक कारण यह है कि हमने छोटे-छोटे नदी-नालों के बहाव को रोक दिया है। इसलिए थोड़ी भी बारिश होती है, तो शहरों में पानी भर जाता है। उत्तर बिहार के जो इलाके बाढ़ के मामले में खतरनाक माने जाते हैं, वहां पानी को सहेजने के परंपरागत ढांचे यानी तालाब, बंधान, कुएं, बाबड़ी सब खत्म हो गए हैं। सतपुड़ा से निकलने वाली नदियों में बाढ़ का कारण भी यही माना है। वहां भी हर गांव में तालाब थे, जो अब दिखाई नहीं देते। बाढ़ का एक और कारण कैचमेंट एरिया का प्रवाह कम होना है। यानी जो घना जंगल था, वह कम हो गया। जंगल ही बारिश के पानी के प्रवाह को कम रखते थे या रोकते थे। जंगल कम होने से अब पानी बिना रुके खेतों व गांवों में चला आता है। इसके अलावा, रासायनिक खेती भी बाढ़ का एक कारण है, क्योंकि यह मिट्टी की जलधारण क्षमता को कम कर देती है।
बाढ़ से निपटने की पूर्व तैयारी होनी चाहिए। कहने को तो आपदा प्रबंधन का ढांचा राष्ट्रीय से लेकर जिला स्तर तक है, पर वह व्यवस्थित ढंग से काम नहीं करता। नदी किनारे वृक्षारोपण कर और ग्रामीण इलाकों में अनाज को बचाने के लिए गोदाम बनाकर बाढ़ से होने वाली क्षति कम की जा सकती है। नदियों के जल-भराव, भंडारण और पानी को रोकने और सहेजने के परंपरागत ढांचों को फिर से खड़ा कर भी बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।