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पहला दौर, भाजपा बनाम बसपा

Wed, 27 Jul 2016 11:15 AM IST
नीरजा चौधरी
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नीरजा चौधरी
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भारतीय राजनीति विडंबनाओं से भरी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश में गाली की राजनीति का जो दौर चला है, उसने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), दोनों को नया जीवन दिया है। सबसे पहले भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष (अब निलंबित) दयाशंकर सिंह ने बसपा प्रमुख मायावती के लिए अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल किया, फिर बसपा कार्यकर्ताओं ने उसका विरोध करते हुए दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया।
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स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी, फतेह बहादुर जैसे महत्वपूर्ण नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद लड़खड़ाती हुई मायावती की पार्टी को अचानक इस घटना से नया मुद्दा मिल गया। बैकफुट पर आई भाजपा, जो 2014 में नरेंद्र मोदी को मिले दलितों का समर्थन खोना नहीं चाहती, तुरंत दयाशंकर सिंह को पार्टी से बाहर निकालने के लिए मजबूर हुई। और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने व्यक्तिगत तौर पर संसद में बिना शर्त माफी मांगी।

गुजरात के उना की घटना के बाद मायावती के लिए अपशब्द के प्रयोग ने दलितों को सदमे में ला दिया। उना में मृत गाय की खाल निकालने के कारण दलित लड़कों को कार से बांधकर पीटा गया था, जिससे दलितों में दहशत फैल गई। आश्चर्य नहीं कि हर दिन देश के किसी न किसी हिस्से से दलितों के अपमान और दुर्व्यवहार की खबरों ने बसपा को 'दलितों के खिलाफ अत्याचार' के भावनात्मक मुद्दे को उत्तर प्रदेश में उठाने के लिए प्रेरित किया।
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हालांकि मायावती के खिलाफ अपशब्द के प्रयोग से यह अलग है, जिसे बसपा ने एकबारगी चुनावी मुद्दा तक बनाने का फैसला कर लिया था, ठीक जयललिता की तरह, जिन्होंने 1989 में विधानसभा के भीतर द्रमुक सदस्यों द्वारा उनकी साड़ी खींचे जाने पर 'द्रौपदी' जैसा मुद्दा बना दिया था।

मगर लगता है कि जयललिता का अनुसरण करने के बजाय मायावती का इरादा कुछ और है। इसकी वजह है कि उत्तर प्रदेश जाति के आधार पर पूरी तरह से बंटा हुआ है और मायावती जानती हैं कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए उन्हें दलितों के अलावा अन्य जातियों का भी समर्थन चाहिए। वर्ष 2007 में एक बार जब उन्होंने अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया, तो उन्होंने दलितों, मुसलमानों और ब्राह्मणों का एक सफल गठजोड़ तैयार किया, जिसने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के जनाधार में सेंध लगाया।

इसलिए जब बसपा कार्यकर्ताओं ने दयाशंकर की पत्नी और बेटी के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया और ऊंची जातियों में उसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया हुई तथा भाजपा के प्रति ठाकुरों (दयाशंकर सिंह इसी समुदाय से आते हैं) में सहानुभूति पैदा होने लगी, तो मायावती ने अपने तेवर ढीले कर लिए। यह जानते हुए कि दलित बनाम ऊंची जातियों का ध्रुवीकरण दीर्घकालीन मायनों में उनके हित में नहीं होगा, बसपा सुप्रीमो ने अपने रुख में नरमी लाते हुए कहा कि दयाशंकर सिंह को गिरफ्तार करो वरना वह पूरे उत्तर प्रदेश में सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय आंदोलन करेंगी।

ब्राह्मणों से अलग मुसलमानों का समर्थन मायावती के लिए महत्वपूर्ण होने जा रहा है। हैरानी नहीं कि उन्होंने करीब सौ टिकट मुसलमानों को बांटे हैं और वह बार-बार दोहराती हैं कि मुस्लिम और दलित, दोनों पर एकसाथ हमले हो रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने नसीमुद्दीन सिद्दिकी को लखनऊ में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने का प्रभार सौंपा। लेकिन मुसलमान अब भी इस दुविधा में हैं कि विधानसभा चुनाव में वे किसका समर्थन करेंगे और 2017 के चुनाव का इक्का इन्हीं के हाथों में है, जो 2014 की तरह अपने वोट को बंटने नहीं देना चाहते।

कुल मिलाकर ताजा प्रकरण ने मायावती के लिए संजीवनी का काम किया है। इस विवाद ने बसपा कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है और दलित मतदाता भी उनके पक्ष में एकजुट हुए हैं और इसमें गैर जाटव भी हैं, जिनमें से 45 फीसदी ने 2014 में भाजपा को वोट दिया था। जाटव ने बसपा के पक्ष में मतदान किया था, हालांकि जाटवों का एक वर्ग (18 फीसदी) लोकसभा चुनाव में मोदी के पक्ष में था। इस ताजा प्रकरण से भाजपा को भी संजीवनी मिली है, जिससे ऊंची जातियों का समर्थन उसके पक्ष में मजबूत हुआ है।

हालांकि दो वर्ष पहले तीन चौथाई ऊंची जातियों ने मोदी के पक्ष में वोट दिया था, लेकिन राज्य विधानसभा चुनाव की अपनी गति होती है और ब्राह्मणों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। कांग्रेस द्वारा शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से ब्राह्मणों में एक नई सरगर्मी है। शीला दीक्षित उत्तर प्रदेश की बहू हैं। लेकिन अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी और कांग्रेस दिल्ली से कानपुर बस यात्रा के जरिये अपने जनाधार की थाह ले रही है। कांग्रेस को प्रदेश में प्रमुख भूमिका में आने के लिए पिछले 27 वर्षों में खोए जनाधार को वापस पाना होगा। कांग्रेस मुसलमानों की पहली पसंद होती, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं है।

जिस तरह मायावती जानती हैं कि सत्ता पाने के लिए सिर्फ दलितों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता, उसी तरह नरेंद्र मोदी और अमित शाह को भी ऊंची जाति, पिछड़ा वर्ग और दलित समेत व्यापक हिंदू समाज का समर्थन पाने का प्रयास करना होगा। वे हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के जरिये ऐसा करने की कोशिश करेंगे। पिछड़ा वर्ग को भाजपा से जोड़ने के लिए भाजपा आलाकमान ने एक अल्पज्ञात कुशवाहा जाति के नेता को प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष बनाया है।

नसीमुद्दीन सिद्दिकी पर लगातार हमले करके भाजपा ने आसानी से इसे 'हमारी (हिंदू) बहू-बेटियां निशाने पर है' जैसे मुद्दे में तब्दील कर दिया है, जिस तरह 'लव जिहाद' के जरिये ऊंची जातियों के गुस्से को जगाया गया था। विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तो कुछ महीनों बाद दिखेगी, लेकिन ताजा राजनीतिक प्रकरण ने प्रदेश में चुनावी विमर्श को भाजपा बनाम बसपा के करीब ला दिया है।
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