वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने न केवल समाज की उम्मीदों पर खरा उतरने की, बल्कि देश की संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को राहत पहुंचाने की भी चुनौती होगी। केंद्रीय बजट इन उम्मीदों को पूरा करने के मद्देनजर मोदी सरकार के लिए पहला बड़ा इम्तिहान होगा। मगर नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, अर्थव्यवस्था को पुर्नजीवन देते हुए खाद्य महंगाई पर काबू पाना और रोजगार के नए अवसरों का सृजन करना।
दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा विरोधाभाष यह है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती-किसानी पर निर्भर है, मगर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती का हिस्सा करीब 14 फीसदी है। दुनिया के तमाम देशों का अनुभव बताता है कि जीडीपी में खेती का हिस्सा कम होने के साथ समग्र रोजगार में इसका प्रतिशत भी घटता है, मगर भारत में ऐसा नहीं हुआ है।
इसके अलावा भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार देखने को मिला है कि पिछले छह वर्षों में अधिकांश अवधि के दौरान दहाई में विकास दर रहने के बावजूद खाद्य महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही। वित्त मंत्री को महंगाई पर नियंत्रण रखने में खासी मशक्कत करनी पड़ेगी, क्योंकि इसके लिए न केवल सरकारी मंत्रालयों, बल्कि पूरे राजनीतिक हलके में समन्वय और सभी को साथ लेकर चलने की जरूरत होगी।
देखना यह भी है कि सरकार कॉरपोरेट खेती के लिए क्या पहल करती है। अगर सरकार भूमि सुधारों को लेकर वाकई गंभीर है, तो उपजाऊ कृषि भूमि और बेकार पड़ी जमीन, दोनों को लंबे समय के लिए पट्टे पर देने पर विचार करना होगा। चीनी उद्योग के लिए सरकार की ओर से इसके लिए सबसे बड़ी मदद यह होगी कि चीनी कंपनियों को उपयुक्त क्षेत्र को चुनने की आजादी दी जाए, ताकि वे गन्ने के विकास पर ध्यान दे सकें, और उत्कृष्ट बीजों व खेती के बेहतर तौर-तरीकों के जरिये फसल की उत्पादकता को बढ़ा सकें।
कॉरपोरेट क्षेत्र को लंबे समय के लिए जमीन पट्टे पर देने का साधारण उपाय खेती से जुड़ी तमाम समस्याओं का समाधान साबित होगा। कृषिगत श्रम के दायरे में बढ़ोतरी करते हुए चाय उद्योग की तरह न्यूनतम पारिश्रमिक की व्यवस्था को लागू करने का फायदा छोटे किसानों समेत पूरे कृषि क्षेत्र को मिलेगा। इसके अलावा कर संबंधी नीतियों को आसान बनाने की भी जरूरत है। इसके लिए महज इतना काफी है कि खेती में करों में छूट के वर्तमान दायरे को बढ़ाते हुए, इसे पट्टे पर ली गई जमीन पर भी लागू करने की व्यवस्था की जाए। इससे देश में खेती को लेकर व्याप्त नजरिये में बड़ा बदलाव आएगा।
दरअसल एक ओर जहां सरकार से बड़ी योजनाओं की उम्मीद की जा रही है, वहीं सिर पर खड़े सूखे की आशंका और इराक के हालात की वजह से तेल के दाम को लेकर पूरी दुनिया में फैली अनिश्चितता ने सरकार के लिए चुनौती अधिक मुश्किल बना दी है। कुछ भी हो, सरकार को लेकर बन रही आम धारणा यह आशंका पैदा करती है कि नए बजट में होने वाली घोषणाएं, केवल बाजार के हितों को साधने वाली साबित होने वाली हैं। हालांकि हकीकत इसके उलट भी हो सकती है, जिसे हर कोई सुनना और समझना चाहेगा।