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नौनिहालों को आखिरकार स्कूल के भारी बस्ते से छुटकारा मिलने का रास्ता हुआ साफ

रमेश ठाकुर Published by: रमेश ठाकुर Updated Sat, 12 Dec 2020 02:53 AM IST
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school bag

नौनिहालों को आखिरकार स्कूल के भारी बस्ते से छुटकारा मिलने का रास्ता साफ हो गया। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुसार अब पहली से लेकर 10वीं तक के छात्र-छात्राओं के स्कूली बस्ते का भार उनके शारीरिक वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। केंद्र सरकार के इस निर्णय को निश्चित रूप से क्रांतिकारी कहा जाएगा, क्योंकि बच्चे अब भारी बस्तों के बोझ से मुक्त होंगे। यह मांग बीते कई वर्षों से उठ रही थी। अनेक शिक्षाविदों ने सरकारों को इस बावत सुझाव दिए थे, पर पूर्व की सरकारों ने ज्यादा गौर नहीं किया। शिक्षाविदों ने बस्तों के बोझ के दुष्परिणामों से सरकारों को अवगत भी कराया था। अब पहली-दूसरी कक्षा के बस्ते का वजन डेढ़ किलो से ज्यादा नहीं रहेगा। तीसरी से पांचवीं कक्षा तक यह सीमा तीन किलो तय होगी। वहीं, छठी व सातवीं कक्षा के छात्रों के बस्ते का बोझ सिर्फ चार किलो निर्धारित किया है। इतना वजन बच्चे आसानी से उठा सकेंगे। 



बस्तों के बोझ ने बच्चों को कितना नुकसान पहुंचाया, यह बताने की जरूरत नहीं है। उनकी रीढ़ की हड्डियां कमजोर होने के साथ-साथ वे कई अन्य बीमारियों से भी घिर गए हैं। जन्म से कुपोषित बच्चे बस्तों का भार उठाने में शुरू से असक्षम ही रहे। अब सरकार ने डिजिटल व्यवस्था पर ज्यादा जोर दिया है। नई नीति में एक और अच्छी बात कही गई है कि बच्चों को ज्यादा होमवर्क नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा प्रत्येक स्कूल में बच्चों के स्वास्थ्य की नियमित जांच के लिए प्रबंधकों को डिजिटल मशीनें रखने और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने को कहा गया है। कई बार देखने में आया है कि स्कूलों में स्वच्छ जल की व्यवस्था न होने से बच्चे दूषित पानी पीते हैं, जिससे वे बीमार हो जाते हैं। सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इसे नई शिक्षा नीति में जोड़ा है।


लेकिन नियमों को सही ढंग से लागू करना स्कूलों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। शिक्षा के पूर्व नियमों पर किए गए शोध अध्ययन के आधार पर स्कूल बस्ते के मानक भार को लेकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की सिफारिश है, जिसे सार्वभौमिक तौर पर स्वीकार किया गया है। काफी अध्ययन के बाद ही सरकार ने अंतिम निर्णय लिया है। लेकिन देखना यह होगा कि निजी स्कूल प्रतिस्पर्धा की होड़ में कहीं इस नई नीति में पलीता न लगा दें। निजी स्कूलों में दिखावे की बड़ी होड़ रहती है और वे इस कारण बच्चों को काफी होम वर्क देते हैं, जिससे उनके बस्ते का वजन बढ़ जाता है। हालांकि सरकारी स्कूलों के बैग हमेशा से सीमित रहे हैं। निजी स्कूल दिखावे के चलते कुछ न कुछ अतिरिक्त विषय पढ़ने का बोझ बच्चों पर जबरन डालते हैं। भारी बस्तों के कारण बच्चे कई तरह की शारीरिक समस्याओं से जूझते हैं, जैसे स्पॉनडिलाइटिस, झुकी हुई कमर और पोस्चर जैसी बीमारियां। उनके उठने-बैठने का ढंग भी प्रभावित होता है। कुछ बच्चों की असमय मौत भी हुई, जिसका मुख्य कारण स्कूलों का भारी बस्ता और दिमाग पर पढ़ाई का अतिरिक्त दवाब सामने आया।


एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया की शोध रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक स्तर के तकरीबन तीस से चालीस फीसदी बच्चों को कमर दर्द रहता है, जिससे उनमें पोस्चर संबंधी समस्या बढ़ती है। चिकित्सक हमेशा अभिभावकों को सलाह देते रहे हैं कि बच्चों से वजन न उठवाएं और उन्हें मानसिक रूप से आजाद रहने दें। लेकिन जब बच्चों को स्कूलों से पांच-सात घंटों का होम वर्क मिलेगा, उनका खेलना-कूदना, मस्ती करना सब प्रभावित होगा, तो निश्चित रूप से बच्चा मानसिक रूप से तनावग्रस्त होगा। 


खैर, इन सभी समस्याओं से छुटकारा दिलाने के मकसद से ही केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति को लागू करने का निर्णय लिया है। केंद्र के इस निर्णय को हर कोई सराह रहा है, लेकिन इससे कुछ निजी स्कूलों को आपत्ति है। उनका कहना है कि इससे शिक्षा के स्तर में गिरावट आएगी। अलबत्ता अब सभी स्कूलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे स्कूल में टाइम टेबल के हिसाब से ही पुस्तकें लाएं। बेहतर होगा कि सभी स्कूल नई शिक्षा नीति को अमल में लाएं और उसका ईमानदारी से पालन करें।

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