सत्तर में से 67 सीटें जीतकर आम आदमी पार्टी ने हाल ही में दिल्ली के विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया था। मगर पिछले कुछ हफ्तों में पार्टी की छवि जनता के सामने काफी खंडित हुई है। जिस तरह आम आदमी पार्टी में उथल-पुथल जारी है, क्या देश की जनता एक बार फिर बाबा भारती की कहानी याद करेगी? आखिर किस दल पर वह भरोसा करे? साफ-सुथरी राजनीति का वायदा करने वाली पार्टी आज आंतरिक लोकतंत्र के सवाल पर अपनों से ही घिर गई है। क्या आम आदमी के राजनीतिक भरोसे का मापदंड अच्छे आदमी की पार्टी पर विश्वास करना हो सकता है? उल्लेखनीय है कि कभी अरविंद केजरीवाल राइट टु रिकॉल और सेंस ऑफ पब्लिक मूड जैसी बातें किया करते थे, मगर हालिया प्रकरण पर लोगों की राय उनके लिए शायद मायने नहीं रख रही। ऐसे में, आप की अंदरूनी लड़ाई और बदतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को देखकर दिल्ली का वह आम आदमी क्या करे, जिसने बड़ी उम्मीदों के साथ अपना मत उसे दिया था?
बहरहाल, आम आदमी पार्टी की इस पूरी स्थिति के विश्लेषण के तीन पक्ष हैं। पहला ऐतिहासिक पक्ष है, जिसका जुड़ाव कांग्रेस विरोधी मुहिम से है। कांग्रेस के विरोध में पहले भी मजबूत जनांदोलन हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चित आपातकाल के विरोध का जयप्रकाश के नेतृत्व वाला आंदोलन (जेपी आंदोलन) रहा है। उस आंदोलन से कई दिग्गज नेता जुड़े थे, जिनमें मोरारजी देसाई, राजनारायण, कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नांडीज अग्रणी थे। तब कांग्रेस के विरोध में मुखरता से आवाजें उठीं, लेकिन जब चुनाव के उपरांत आंदोलन ने एक पार्टी का रूप लिया और उस पार्टी को सत्ता मिली, तो व्यक्तिवादी अंतरविरोध की पराकाष्ठा भी उसमें देखने को मिली। जनता पार्टी की सरकार में स्वयं शांति भूषण कानून मंत्री बने, लेकिन मोरारजी देसाई के विरोध में चरण सिंह और देवीलाल गुट भी खड़े हुए, जिस कारण वह सरकार स्थायी नहीं रह सकी। इसी तरह, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में में भी नब्बे के दशक बाद से जितनी सरकारें बनीं, वे मुख्यतः कांग्रेस विरोध में ही पनपीं। मगर कई दलों का संगम रहीं ऐसी सरकारों में गठबंधन दलों में आपसी सामंजस्य नहीं हो पाया, जिस कारण वह मुहिम कमजोर साबित हुई।
दूसरा पक्ष जनमोर्चा और वीपी सिंह की अगुवाई में की गई गैर कांग्रेसी मुहिम से जुड़ा है। यहां भी जो दल कांग्रेस के विरोध में पनपे, वे बाद में आपस में ही झगड़ने लगे। मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के कारण वीपी सिंह सरकार का गिरना हो या फिर जनमोर्चा सरकार की उठापटक। इस लिहाज से देखें, तो आम आदमी पार्टी कोई अपवाद नहीं है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से इसका जन्म हुआ है। उस आंदोलन से साफ-सुथरी छवि वाले लोग जुड़े थे, पर जब पार्टी बनाने की बात आई, तो यह सवाल भी उठा था कि कहीं पूर्व की तरह यह भी व्यक्तिवाद और अंतरविरोधों से तो नहीं घिर जाएगी। हालांकि दो विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में सभी धड़ों ने एक साथ चुनाव लड़ा, जिससे यह उम्मीद जगी थी कि आम आदमी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का बड़ा उदाहरण देखने को मिलेगा। मगर यह यहां भी दिवास्वप्न ही साबित हुआ। लोगों को अंदाजा नहीं था कि आम आदमी पार्टी में भी अंदर ही अंदर व्यक्तिवादी अंतरविरोध सुलग रहा है। कुल मिलाकर कहें, तो आजादी के बाद से कांग्रेस के विरोध में मुहिम तो हुई है, पार्टियां भी बनीं, सरकारों का भी गठन हुआ, पर व्यक्तिवादी अंतरविरोध की वजह से कांग्रेस विरोधी ऐसे आंदोलन स्थायी नहीं रह सके। वे अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी है कि आम आदमी पार्टी के इस पूरे प्रकरण का भारतीय राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा ही। अव्वल तो आप फिलहाल एक बड़ी ताकत नहीं है, और फिर इसका बड़ा प्रभाव दिल्ली में ही है। इसके नेता आशुतोष ने कभी कहा था कि आप में विचारों का समुद्रमंथन होगा। मगर यह समुद्रमंथन तो नहीं हुआ, अलबत्ता मीडिया में आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते रहे और एक-दूसरे पर जुबानी तीर छोड़े गए। जिस तरह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे पार्टी के संस्थापक नेताओं को पार्टी से बाहर निकालने की कोशिश हो रही है, उससे एक बार फिर यही साबित हुआ कि तंत्र की राजनीति जनांदोलन की राजनीति पर भारी पड़ती है। आप भी अब कोई जनांदोलन वाली पार्टी नहीं, बल्कि सत्ता की होड़ में बनी रहने वाली पार्टी बन गई है।
जहां तक आम आदमी की बात है, तो आप के हालिया विवाद से उसके भरोसे को ठेस जरूर पहुंची है। मगर अच्छी बात यह है कि लोगों की नजर में आप अब भी दूसरे दलों के बनिस्बत एक ईमानदार पार्टी है। इसकी वजह भी है। असल में, आप पर भ्रष्टाचार के वैसे दाग नहीं हैं। भले ही इसके आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उठे हैं, पर अब तक पार्टी के किसी नेता द्वारा गबन या घोटाले की खबर नहीं है। असल में, जनता इसलिए मायूस है, क्योंकि उसने बड़े मुद्दों पर अपना जनादेश दिया था। करीब एक साल रहे राष्ट्रपति शासन के बाद जब उन्हें अपना वोट देने का मौका मिला, तो उन्हें भरोसा था कि दिल्ली की नई राज्य सरकार उनकी समस्याओं का समाधान करेगी। मगर अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। जनता की मांग यही रहती है कि रोजमर्रा की चीजों की कीमतें कम हों, रोजगार के संकीर्ण हो रहे अवसरों का समाधान हो, उनकी जीवन शैली बेहतर बने। इन मुद्दों पर अब तक कोई ठोस प्रयास न होने की वजह से जनता खुद को ठगा महसूस कर सकती है। यानी वह मायूस है, मगर हताश नहीं। बदलाव का उसे अब भी इंतजार है।
-दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक एवं राजनीतिक विश्लेषक