उन्हें गुस्सा आ गया। वे अच्छे-खासे मार्च एंडिंग की टेंशन से बाहर निकले थे कि अप्रैल में कदम रखते ही किसी ने उन्हें 'फूल' बना दिया। मानो सिर मुंडाते ही ओले पड़े। ऐसे में उनका गुस्से में आना स्वाभाविक था। जबकि उन्हें गुस्सा तो तब भी नहीं आया था, जब श्रीमान काटजू साहब ने उन्हें नब्बे प्रतिशत भारतीय मूर्खों वाली सूची में डाला था! हालांकि अप्रैल फूल बनाने वाले ने लाख सफाई दी कि...मेरा क्या कुसूर, जमाने का कुसूर, जिसने दस्तूर बनाया। फिर भी उनका गुस्सा कम नहीं हुआ।
यों तो उन्हें गुस्सा आता नहीं। अपवादस्वरूप ही यदा-कदा आता है। वह गुस्सा तब भी नहीं हुए थे, जब कोई उन्हें एक साल, पांच साल, साठ साल तक फूल बनाता रहा, और कभी इसके लिए सफाई भी नहीं दी। यह हवाला तक नहीं दिया कि ऐसा किस दस्तूर के तहत किया जा रहा है। वह तब भी शांत रहे, जब कोई उनसे अच्छे दिनों का वायदा कर गया और अच्छे दिनों का एक झोंका तक नहीं आया। वह तब भी मुस्कराते रहे, जब कोई ऊंची फेंक गया कि उनके खाते में काला धन लाकर पंद्रह लाख रुपये डाल दिए जाएंगे, मगर एक पाई ना डाली। महंगाई की मुंह दिखाई में सस्ताई देने का पासा फेंकने के बावजूद कुछ नहीं मिलने को भी वह हंसते-हंसते झेल गए। बिजली, पानी, सड़क, पुल, नौकरी का झांसा देकर उन्हें फुल फूल बना गए, लेकिन क्या मजाल कि एक बार भी वह गुस्सा हुए हों। वह मुस्कराते रहे, और नियति मानकर सब सह गए। लोकपाल, फ्री वाई-फाई, ईमानदारी जैसे न जाने कितने भ्रम उनके टूटे। उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। माना सिर्फ यह था कि जो चीज सिर्फ आश्वासनों में ही मिल सकती है, उसके लिए हकीकत में गुस्सा क्यों करना! सो हमेशा निश्चल, निर्विकार और निर्लिप्त बने रहे।
फिर आज उन्हें गुस्सा क्यों आया? शायद दुखती रग पर हाथ पड़ गया। यही उलटबांसी है। कभी-कभी सुई की छेद से हाथी निकल जाते हैं, दुम अटक जाती है। उनके धैर्य की छेद में कोई दुम अटकी है शायद, इसलिए उनको गुस्सा आया...!