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त्योहार: समय बदल रहा है, पैमाने भी बदलें ताकि बची रहे भविष्य में पर्वों की उजास

मोनिका शर्मा
Updated Fri, 10 Oct 2025 07:17 AM IST

सार

करवा चौथ आस्था से जुड़ा पर्व है। इस पर सवाल उठाने के बजाय पैमाने बदलने पर बात होनी चाहिए, ताकि भविष्य में पर्वों की उजास तो बची रहे, पर उनसे जुड़ी बंदिशें टूटें।
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करवा चौथ - फोटो : पीटीआई


यह सच है कि रूढ़िवादी सोच स्त्री जीवन के लिए दंश रही हैं। कई परंपरागत पर्वों के रिवाज महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखने की सोच से जुड़े रहे हैं, पर सच यह भी है कि समय के साथ ऐसे व्रत-उपवास करने से जुड़ी परंपराओं को निभाने के तरीके काफी बदल गए हैं। इनसे जुड़ी आस्था के मायने भी अब नए रंग में दिख रहे हैं। बावजूद इसके इन बदलावों को दिल से स्वीकारने के बजाय उससे जुड़े नकारात्मक पक्षों को साझा करने की मानो होड़ लगी रहती है। सोशल मीडिया के सभी मंचों पर अब स्त्री विमर्श से जुड़े मुद्दे कम और पर्व-त्योहारों के विरोध की बातें ज्यादा साझा की जाती हैं, जबकि ऐसे पर्वों को मनाने के मामले में आई सहजता को भी गहराई से समझा जाना चाहिए, जो महिलाएं मन से इन्हें मानना चाहती हैं, उनके विचारों का भी मान किया जाना चाहिए।


दुखद है कि हम टूटते परिवारों और बिखरते सामाजिक ताने-बाने में संबंधों को थामने और साधने का काम कर रहे रीति-रिवाजों का सकारात्मक पक्ष देखना ही भूल रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य सहेजने के मोर्चे पर चिंता करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि सुखद दांपत्य भी भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है। करवा चौथ जैसे पारंपरिक पर्व भी आपसी जुड़ाव को ही पोसते हैं। साथ ही परंपरागत रिवाजों से जुड़ाव रखना आज कोई मजबूरी नहीं है। अपनों और अपने परिवार की खुशहाली की कामना संग अगर त्योहार मन से मनाए जाते हैं, तो क्या बुरा है? खासकर तब, जबकि आज मान्यताओं के मायने भी बदल गए हैं। अहोई अष्टमी जैसा व्रत कभी बेटों के आयुष्य की कामना से जुड़ा था। आज माताएं बेटे-बेटी के भेद से दूर अपने बच्चों की सुरक्षा और अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह अनुष्ठान करती हैं। करवा चौथ व्रत की परंपरा में भी सुखद परिवर्तन नजर आते हैं।


नई पीढ़ी के पति, अपनी पत्नी की निष्ठा, समर्पण और प्रेम की कद्र करना सीख गए हैं। घर-परिवार में पत्नी की भूमिका को खुलकर सराहने लगे हैं। पत्नी गृहिणी हो या कामकाजी, उसकी जद्दोजहद को समझते हैं। सुखद है कि औपचारिकताओं के परे हमारे परंपरागत पर्व मन की रीत से जुड़ गए हैं। वहीं विरोध की मानसिकता आज भी इन पर्वों के पुरातन स्वरूप तक ही सिमटी है। जरूरी है कि समय के साथ आए इन बदलावों को मान दिया जाए, ताकि भविष्य में पर्वों की उजास तो बची रहे, पर उनसे जुड़ी बंदिशें टूटें। ध्यान रहे कि तार्किक बातों के बजाय अंध विरोध करने की प्रवृत्ति भी स्त्री जीवन के लिए दंश ही है।

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