दिवाली का प्रारंभ रमा एकादशी से होता है। इस अवसर पर भगवान विष्णु की पूजा होती है। इसके बाद जो अगली एकादशी आती है, उसे देवोत्थान एकादशी कहते हैं। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जाग्रत होते हैं, और उसके बाद भारतीय समाज में विवाहादि शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। दिवाली के महापर्व का प्रारंभ धनतेरस से होता है, जो तेरहवीं तिथि को आता है। इस दिन यम दीपक भी जलाया जाता है।
धनतेरस के दिन महिलाएं और अन्य लोग श्रद्धा और आवश्यकता के अनुसार सोना, चांदी, बर्तन इत्यादि खरीदते हैं। इसके बाद नरक चतुर्दशी या काली चौदस आती है, जिसे हनुमान पूजा भी कहते हैं। इसे छोटी दिवाली के रूप में भी मनाया जाता है। नरक चौदस की पूजा रात में होती है। कहीं-कहीं इसे शारदा पूजा या केदार गौरी का व्रत भी कहते है। उसके अगले दिन दिवाली मनाई जाती है।
दिवाली के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। जबकि देश के खासकर पूर्वी हिस्से में इस दिन धूमधाम से काली पूजा होती है। दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा होती है। इस दिन गुजराती नववर्ष का भी शुभारंभ होता है। इसके बाद अगले दिन भाई दूज का त्योहार आता है, जिसमें भाई-बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और सम्मान करते हैं। कुछ लोग विश्वकर्मा पूजा भी उसी दिन करते हैं। ये छह-सात त्योहारों की लड़ी दिवाली के साथ समाज में प्रचलित है। यह परंपरा अनंत काल से चली आ रही है। अगर आधुनिक युग में हम देखें, तो हमारी युवा पीढ़ी का इस त्योहार के सांस्कृतिक पक्ष से जुड़ाव बहुत आवश्यक है, क्योंकि, यह अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाने वाला पर्व है। इसीलिए इसको प्रकाशोत्सव भी कहा जाता है।
दिवाली हमारी सभ्यता व संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जैसे कि भगवान राम। गौर करने की बात है कि सभ्यता और संस्कृति दो शब्द हैं। पुरातात्विक साक्ष्य भी इसका प्रमाण हैं कि दिवाली सदियों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है। राम मंदिर के लिए अयोध्या में जब उत्खनन किया जा रहा था, तब यह पता चला था कि मंदिर का स्थान नौवीं- दसवीं सदी के बाद का है। लेकिन उससे पहले वहां आवासीय स्तर के अवशेष मिले हैं। उसमें 1580 ईसा पूर्व से आगे के समय में भी प्रकाश पड़ता है। रेडियो कार्बन डेटिंग विधियों से पता चलता है कि वहां मंदिर बने, फिर उन्हें ध्वस्त किया गया। लेकिन इन अवशेषों में मिट्टी के दीये काफी संख्या में मिले हैं। अयोध्या में खुदाई के दौरान जो दीये मिले, वे ठीक वैसे ही हैं, जैसे आज दिवाली में उपयोग में लाए जाते हैं।
दिवाली की यह जो सनातन परंपरा है, वह केवल उपहार देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उपहार देने की परंपरा तो लोक-प्रचार वाली चीज है, जो विभिन्न समाजों में विकसित हुई है और जिसमें कोई बुराई भी नहीं है। यह एक-दूसरे को सम्मान देने का एक तरीका है। इससे आपसी भाईचारा बढ़ता है। हालांकि यह भी सच है कि हमारे बचपन में उपहार देने की यह प्रथा इस रूप में नहीं दिखती थी, जिस तरह कि आज है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा नहीं है।
युद्धों से त्रस्त वर्तमान दुनियावी माहौल में मनाई जा रही इस बार की दिवाली खास है। युद्ध पहले भी हुए हैं और उनके बीच दिवाली पहले भी मनाई जाती रही है। वस्तुत: हर युद्ध मानवता के लिए एक सीख की तरह होता है। दिवाली की रोशनी में यह सीख साफ तौर पर दिखती है कि गलत इरादे से किया गया मानवता को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी प्रयास अंतत: सभी को कमजोर करता है।