होली रंगों का त्योहार है, पर इतना कहना भर काफी नहीं है। वह तो रंगों को मलने का, उनसे किसी को भिगो देने का, सराबोर कर देने का भी त्योहार है। और यह त्योहार है किसी आत्मीय को, किसी परिचित को और अपरिचित को भी अंक में भर लेने का। हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है-आज नहीं बरजेगा कोई/मनचाही कर लो/होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो/जो हो गया विराना उसको फिर अपना कर लो/होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो।
यह परिचय रंगों के माध्यम से होता रहा है। गुलाल-अबीर को मुट्ठी में लेकर चलने से होता रहा है। पर इस साल रंगों की वैसी छूट नहीं है। कोविड-19 ने सार्वजनिक जगहों में उन्हें बरज दिया है, जैसा कि पिछले वर्ष भी किया था। पर उन्हें चाहे कोई कितना बरज दे, होली की स्मृतियों को, ब्रज की होली की स्मृतियों को और रंगों में सराबोर होली की यादों को भला कोई कैसे बरज सकता है! सदियों का हमारा यह त्योहार हमारी आत्मा में, हृदय में और हमारे शारीरिक स्पंदनों-स्पर्शों में कुछ इस तरह बस गया है कि 'होली' शब्द कहते ही एक उमंग-सी भर जाती है।
होली होती तो एक दिन है, पर उस तारीख को हर घर-परिवार में महीनों पहले से ही रेखांकित कर दिया जाता है। वह तो एक ऋतु सरीखी है। आम बौरा जाते हैं। कोयल कूकती है। फूलों में एक नई बहार आ जाती है। एक ऐसी बयार भी चलती है, जो मीठी लगती है।मनभावन। दिनों पहले से ही होली के पकवानों की सुगंध आने लगती है। जो घर से दूर हैं, वे घर जाने की बात सोचने लगते हैं। होठ कुछ गुनगुनाने लगते हैं। आज बिरज में होली रे रसिया या रंग बरसे...जैसे गीत मानो बिन बाजे के ही बजने लगते हैं-होली के पहले से ही।
होली के प्रसंग से गीत-संगीत की एक बड़ी संपदा एकत्र होती गई है। वह हमारी धरोहर है। होली के लोकगीतों की प्रायः सभी प्रदेशों में एक बड़ी पिटारी है। और होली की रचनाओं की, आधुनिक-समकालीन रचनाओं की भी कमी कहां है! हिंदी की ही बात करें, तो भारतेंदु से लेकर निराला समेत हम आज तक होली के प्रसंग में कुछ न कुछ लिखते ही आए हैं। आगे भी यह सिलसिला थमने वाला कहां है! होली का विचार ही कुछ ऐसा है कि वह सदा साथ रहने वाला है। उसके मर्म और दार्शनिक-पौराणिक अर्थ बहुत गहरे हैं। होलिका दहन प्रतीक रूप में भी उसी का दहन है, जो कुचक्री है, दुर्नीतिपूर्ण है और जिसे आग के हवाले करके हम मन और वातावरण की निर्मलता की कामना करते हैं। यह भी आकस्मिक नहीं है कि दशहरा पर हम रावण दहन करते हैं और होली पर होलिका दहन। हमारे त्योहार न्याय के पक्ष को खड़ा करने के लिए गढ़े-संवारे गए हैं।
जो भी हो, होली का रंग ऐसा गाढ़ा है, जो छूटकर भी नहीं छूटता। सो कोई बात नहीं, अगर इस बार रंगों वाली होली नहीं होगी। अब भी मास्क पहनने की मजबूरी खत्म नहीं हुई है, न साबुन से दिन में कई बार हाथ धोने की। इन दिनों कोरोना का टीका लगवा चुके बहुतेरे लोगों को आराम करने की सलाह दी गई है। सो मित्र को पलकों में धर लेना अच्छा है। और यह कल्पना कर लेना कि पलकों में धरे हुए हमने उस पर रंग भी लगा दिए हैं, गुलाल भी मल दिए हैं और पिचकारी से रंगों की बौछार भी कर दी है।
कल्पना बड़ी चीज है। और होली की कल्पना भला कठिन ही कहां है! न जाने कितने चित्र, कितनी छवियां, कितनी तस्वीरें, हम सबकी स्मृति में हैं। रंग बरसाती होली की छवियां। और जो बात कभी मनुहार या विनती के रूप में कही जाती थी, बल्कि जो मनुहार नहीं होती थी, एक प्रकार का निमंत्रण होती थी-मत मारो पिचकारी, उसे अब यथार्थ की शक्ल देने में ही भलाई है-इस बार। होली का स्पर्श सुख भी स्थगित रहे, तो रहे, जान है तो जहान है। होली का दिन इस बार भी हर बार की तरह दिल खिला ही देगा। आनंद बख्शी का एक लोकप्रिय गीत यही तो कहता है-होली के दिन दिल खिल जाते हैं...।
इस 'डिजिटल' और 'वर्चुअल' (आभासी) के जमाने में भी फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्स एप आदि पर पिचकारियां भी चलेंगी, और इस बार कुछ ज्यादा ही जोर से चलेंगी, क्योंकि यथार्थ में, आमने-सामने होकर वे नहीं चल रही होंगी। शरीर भीगेंगे नहीं, पर सूखे वस्त्रों पर भी हम होली के रंग कुछ तो महसूस करेंगे ही। फिर ढोल-झांझ पर तो कोई पाबंदी है नहीं। त्योहार कुल मिलाकर एक माहौल की रचना करते हैं। पर कोई हर्ज नहीं, कठिन दिनों में ही माहौल बनाए जाते हैं-अपने-अपने तरीके से। और गुलाल-अबीर भी हम भले न मल सकें, पर उन्हें उड़ाने में, दूर से ही दूसरे की ओर उड़ाने में कुछ तो मजा है ही। होली के मुगल मिनियेचर चित्रों में राजाओं-बादशाहों के होली जुलूस में उड़ते गुलाल-अबीर की छटाएं देखने को मिलती ही हैं। हर त्योहार सद्भाव का भी त्योहार होता है। और होली तो है ही सद्भाव का त्योहार।