लेकिन मुश्किल यह है कि मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने बाड़ लगाने का विरोध किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से इस संबंध में अनुरोध किया है। फरवरी, 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार के 38,500 से अधिक लोगों ने मिजोरम में शरण ली है, जिससे राज्य प्रशासन पर बोझ बढ़ गया है। रखाइन प्रांत के पश्चिमी हिस्सों में जातीय अकरम सेना (एए) द्वारा सैन्य शिविरों पर कब्जा करने के बाद 500 से अधिक म्यांमार सैनिक मिजोरम में चले आए थे। मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड समेत भारत के पूर्वोत्तर राज्य म्यांमार के साथ 1,643 किलोमीटर लंबी खुली पहाड़ी सीमा साझा करते हैं, जिससे सुरक्षा की समस्या पैदा होती है और निवारक उपायों की जरूरत पड़ती है। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के चीन के साथ घनिष्ठ रिश्ते को देखते हुए भारत को हिंसाग्रस्त म्यांमार में युद्धरत समूहों और सेना जनरलों के बीच शांति स्थापित करके सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्रोहियों का समर्थन करने के अलावा, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के बहाने म्यांमार के नजदीक आने की चीनी रणनीति से उसे बचाने के लिए 'पड़ोसी पहले' की नीति के अनुरूप एक यथार्थवादी रणनीतिक खाका विकसित करने की जरूरत है।
एक फरवरी, 2021 को जब म्यांमार में सेना ने तख्तापलट किया था, तो भारत ने सतर्क रुख अपनाया। भारत ने कूटनीतिक और अप्रत्यक्ष रूप से जुंटा का समर्थन किया था, आंग सान सू की के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक ताकतों का खुले तौर पर समर्थन करने से परहेज किया था, जिसने अब इसे दुविधा में डाल दिया है। भारत के सामने चीन पर अंकुश लगाने की चुनौती है, जो इसलिए खतरनाक है, क्योंकि वह कुछ जातीय समूहों का समर्थन करता है।
इस जटिल परिदृश्य में 'द थ्री ब्रदरहुड एलायंस' द्वारा दिसंबर, 2023 में ऑपरेशन 1027 चलाया गया था, जिसमें ता'आंग नेशनल लिबरेशन आर्मी, एए और म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस आर्मी शामिल थी, जिसने जुंटा को हिलाकर रख दिया था। जुंटा के खिलाफ आक्रामक हमले ने इसे एक विनाशकारी झटका दिया था, जिससे चीन को इसका समर्थन करना पड़ा। 'द थ्री ब्रदरहुड एलायंस' ने प्रमुख सड़कों और सैन्य चौकियों पर कब्जा कर लिया था, जिससे नकदी संकट से जूझ रहे जुंटा के राजस्व पर असर पड़ा और उसकी आवाजाही में बाधा उत्पन्न हुई। रिपोर्टों से पता चलता है कि शान राज्य पर अचानक हुए हमलों के बाद एए ने पश्चिमी तट पर रखाइन प्रांत में अपने बेस में सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यह विद्रोहियों द्वारा पूर्व में थाईलैंड की सीमा से लगे काया राज्य और भारत की सीमा से लगे सागांग क्षेत्र और चिन प्रांत तक फैला एक समन्वित प्रयास था। यह सशस्त्र समूहों और जुंटा के बीच एक साल से जारी संघर्ष विराम का उल्लंघन था।
इस साहसिक कदम से चीन के महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों पर सेना के नियंत्रण को खतरा है, जिससे उसके हितों पर असर पड़ेगा। एलायंस देश के एक हिस्से से जुंटा को अलग करने में सफल रहा है, जिससे होकर चीन के साथ म्यामार का 40 फीसदी द्विपक्षीय सीमा व्यापार होता है; लगभग एक अरब डॉलर का व्यापार चीन में पाइप द्वारा भेजी जाने वाली प्राकृतिक गैस से होता है।
इससे पहले कि इसके चलते भारत के हितों को खतरा हो, भारत को म्यांमार के प्रति अपनी पुरानी स्थिति पर पुनर्विचार करना होगा। भारत का मानना है कि अमेरिका भारत के साथ मिलकर म्यांमार से संबंध बढ़ाने के लिए मौके का फायदा उठाए और मानवीय संकट को कम करने के लिए काम करे, जिससे जुंटा विरोधी ताकतों का समर्थन किया जा सके और संघीय लोकतंत्र की स्थापना की जा सके। भारत ने यह सुनिश्चित करने के लिए सेना और लोकतंत्र समर्थक राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखने की कोशिश की है, ताकि जुंटा चीन के पाले में न चला जाए।
जातीय संगठनों के सशस्त्र विद्रोह ने बेनकाब हुए सैन्य जनरलों को कूटनीतिक झटका दिया है, जिसका सीधा असर चीन पर पड़ेगा। यूक्रेन युद्ध जुंटा के लिए एक वरदान के रूप में आया था, क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ उसमें व्यस्त थे। इस्राइल पर हमास के हमले ने पश्चिमी शक्तियों का म्यांमार से ध्यान हटा दिया है, लेकिन सशस्त्र समूहों के हमले से पूरा परिदृश्य बदल सकता है। म्यांमार में विपक्षी सांसदों द्वारा गठित राष्ट्रीय एकता सरकार (एनयूजी) को पश्चिम का करीबी माना जाता है, जो सशस्त्र समूहों के सफल हमले के बाद प्रोत्साहित महसूस कर रही है।
चीन ने म्यांमार से सीमा पर स्थिरता बहाल करने का आग्रह किया है, जबकि सशस्त्र समूहों के साथ जुंटा का संघर्ष तेज हो गया है। कुछ पूर्व राजनयिक चीन द्वारा अपनाई गई 'दोहरी नीति' से आश्चर्यचकित हैं, जो सक्रिय रूप से उग्रवादी समूहों का समर्थन कर रहा है। म्यांमार के उत्तरपूर्वी शान प्रांत में यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी (यूडब्ल्यूएसए) को चीन से हथियार और राजनीतिक सहायता मिलती है। म्यांमार शासन ने 24 अप्रैल, 2021 को जकार्ता में अपनाए गए पांच सूत्री सर्वसम्मति समझौते को अस्वीकार कर दिया है। इसमें म्यांमार में हिंसा की रोकथाम, एक विशेष दूत का दौरा और सभी हितधारकों के बीच बातचीत शामिल थी। सैन्य जनरलों ने आसियान की शांति पहल को नजर अंदाज करने का विकल्प चुना है, जो अटकी हुई है। पश्चिम आसियान पर म्यांमार के जुंटा को अलग-थलग करने के लिए दबाव डाल रहा है।