नए वर्ष का पहला दिन सामान्य दिनों जैसा होने पर भी अलग लगता है। नए वर्ष से आशाएं भी स्वाभाविक हैं। मेरी आकांक्षा यह है कि 2014 समृद्धि का, स्त्री भयमुक्ति का वर्ष हो। लड़कियों और महिलाओं को सड़कों पर निकलने में किसी का भय न हो, वे किसी भी समय कहीं भी आ-जा सकें। यह कश्मीरी पंडितों का घाटियों में, अपने घरों में लौटने का वर्ष हो। इस वर्ष हम आतंकवाद को निर्मूल करने का संकल्प लें। अपनी पुरानी सभ्यता-संस्कृति और आध्यात्मिकता को अपनाएं।
यह आशा की जा रही है कि पिछले वर्ष लोकतंत्र को शक्ति देने के लिए राजनीतिक स्तर पर जो प्रयास किए गए, इस वर्ष उन्हें और आगे बढ़ाया जाए। भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी के उदय को एक बड़ी घटना बताया जा रहा है। चूंकि उसका सारा जोर भ्रष्टाचार हटाने पर है, इसलिए उसके प्रति समाज और मीडिया में लहर है। लेकिन तत्काल कोई निष्कर्ष देने के बजाय मैं यही कहना चाहूंगी कि यह आम जनता के छोटे-छोटे मुद्दों को भुनाने में ही ज्यादा रुचि रखती है, जबकि भूलना नहीं चाहिए कि इस देश के सामने कई और बड़ी समस्याएं भी हैं।
हमें भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए और आतंकवाद से भी। बल्कि देश के सीमांत हिस्से में रहने वाले लोगों के लिए आतंकवाद एक बड़ा मामला है। आम आदमी पार्टी आतंकवाद को निर्मूल करने के बारे में क्या सोचती है, यह हम नहीं जानते। कश्मीरी ब्राह्मण वर्षों से, दशकों से अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं। केवल सत्ता ने नहीं, समाज ने भी उनकी अनदेखी की है। मैं चाहूंगी कि नए साल में हमारी समस्या का हल हो। नए वर्ष में मैं उस लोकतंत्र की वापसी की इच्छुक हूं, जिसमें आभा हो, प्रभा हो और प्रभाव भी। जिस संविधान के राज की बात कही जाती है, इस वर्ष मैं उसे वास्तव में धड़कते देखने की इच्छुक हूं।
नए वर्ष में मैं जिसे और जोर पकड़ते देखना चाहती हूं, वह स्त्री जागृति से संबंधित है। यह सचमुच उल्लेखनीय है कि बीते एक-डेढ़ वर्ष में देश भर में महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुई हैं। दिसंबर, 2012 में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार की दुखद घटना के बाद समाज थोड़ा जागरूक हुआ है। जिस दिल्ली के लोग आत्मकेंद्रित माने जाते हैं, वहां उस त्रासदी के बाद लोग सड़कों पर उतर आए। यह एक बहुत बड़ा बदलाव था। इस जागरूकता की लहर यहां जम्मू में भी पहुंची है। पिछले दिनों मेरे घर में कुछ काम चल रहा था। काम करने वाली एक स्त्री ने बातों-बातों में अपने पति की हंसी उड़ाई, तो वहीं खड़ा पति इसे अपना अपमान समझकर उस पर धौंस जमाने लगा। मैंने इस पर उसे डांटा, तो उसका दूसरा साथी उसे समझाने लगा, संभल जाओ, जानते नहीं, औरतों के हाथ में ताकत आ गई है!
यह जागरूकता बहुत बड़ा परिवर्तन है। अब अधिकतर स्त्री, चाहे वह किसी भी वर्ग या समुदाय से क्यों न हो, अपने अधिकारों के बारे में सजग होने लगी है। पहले महिलाओं में बहनापा नहीं था। वे दूसरी महिलाओं के बारे में नहीं सोचना चाहती थीं। अब वह स्थिति बदल रही है। लेकिन समाज में आया यह परिवर्तन बद्धमूल सत्ता राजनीति में उस प्रबलता से नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए छियालीस वर्ष से अटके पड़े लोकपाल विधेयक के पारित होने से भी उतनी आशा नहीं है। हम देख चुके हैं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर व्यवस्था बनती है, तो उसके साथ-साथ एक चोर दरवाजा भी खुल जाता है। यह देखना होगा कि लोकपाल के आने से व्यवस्था में कितना परिवर्तन आता है?
लोकपाल के बाद अब महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने की बात की जा रही है। लेकिन क्या इसका वास्तव में कोई लाभ होगा? संसद और विधानमंडलों में महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने से आम महिलाएं राजनीति में आएंगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। स्त्री जागरूकता व्यापक हो और उसका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई पड़े, तभी कुछ सार्थक परिवर्तन हो सकता है।