दरअसल, ये कदम प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सुनियोजित ढंग से किए जा रहे ऐतिहासिक पुनर्लेखन का ही हिस्सा ही अधिक प्रतीत होते हैं, जिसमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के संस्थापक जियाउर रहमान को असली नायक बताने की कोशिश की जा रही है। शेख हसीना के समय में जमात-ए-इस्लामी और दूसरे कट्टरपंथी संगठनों पर सख्ती बरती गई थी, लेकिन अब इन बदलावों के पीछे भी वही शक्तियां दिखती हैं, जो छात्र आंदोलन के बाद हुए तख्तापलट के पीछे थीं।
हाल ही में वहां के शीर्ष न्यायालय द्वारा जमात-ए-इस्लामी का पंजीकरण बहाल करने और चुनाव में उसके हिस्सा लेने के लिए रास्ता खोलने के फैसले को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं पर मोहम्मद यूनुस की चुप्पी उनका असली चेहरा ही सामने लाती है। इसके साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियां भी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर रही हैं।
1971 में पाकिस्तान से आजादी के लिए लड़ा गया युद्ध बांग्लादेश की पहचान का आधार था, लेकिन अब, जब मोहम्मद यूनुस पाकिस्तान के साथ पुराने मुद्दों को सुलझाने की बात कर रहे हैं, यह भारत के लिए चिंताजनक हो सकता है, क्योंकि इससे सीमापार आतंकवाद और घुसपैठ की समस्याएं बढ़ सकती हैं।
बांग्लादेश में शेख मुजीब की विरासत को मिटाने की कोशिशें उस साझा इतिहास को कमजोर करती हैं, जिसमें भारत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। बांग्लादेश के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं, लेकिन वर्तमान बदलाव उसके लिए भी एक बड़ी चुनौती बन रहे हैं। ऐसे में, भारत को पूरी सतर्कता और कूटनीतिक सूझबूझ से काम लेना होगा। यह तब और भी जरूरी हो जाता है, जब अपने पिता की खोज बांग्लादेश को पाकिस्तान की तरफ मोड़ रही है।