चीन और उसके सहयोगियों-जैसै तुर्की, सिंगापुर आदि ने चुपचाप अपने मित्र पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर करने के लिए काम किया, लेकिन अमेरिका की बदली हुई भूमिका से बहुत फर्क पड़ा, क्योंकि वह पाकिस्तान को चीन के चंगुल से दूर करना चाहता है। पाकिस्तान ने दो वर्ष पूर्व ग्रे लिस्ट से बाहर निकालने के लिए अमेरिका से दरख्वास्त की थी और हाल ही में वहां के सेना प्रमुख कमर बाजवा की हफ्ते भर की यात्रा ने इसके लिए जमीन तैयार की, हालांकि दोनों पक्षों की ओर से इस बारे में कुछ नहीं बताया गया।
अपनी धरती पर खूंखार आतंकवादियों को पनाह देने और नियमित वित्तपोषण करने की अपनी प्रतिबद्धता के कारण, पाकिस्तान दुनिया के बाकी हिस्सों से अलग-थलग पड़ गया, जिससे उसे तीन लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ। लेकिन ग्रे लिस्ट से बाहर करने का एफएटीएफ का निर्णय इसे श्रीलंका के रास्ते पर जाने से बचा सकता है, क्योंकि इसे विभिन्न देशों और निकायों जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), एशियाई विकास बैंक (एडीबी), आदि से सहायता मिलनी शुरू हो जाएगी।
लेकिन भारत को अब भी आशंका है कि पाकिस्तान खुद को आतंकी फंडिंग की लत से दूर रख पाएगा। हालांकि यह वैश्विक हित में होगा, यदि इस्लामाबाद अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों से आतंकवाद और आतंकवादी वित्तपोषण के खिलाफ विश्वसनीय, सत्यापन योग्य, अपरिवर्तनीय और निरंतर कार्रवाई करना जारी रखता है। भारत को दृढ़ता से लगता है कि एफएटीएफ की जांच के परिणामस्वरूप पाकिस्तान को कुख्यात आतंकवादियों के खिलाफ कुछ कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया गया है, जिसमें 26/11 मुंबई हमले से संबंधित आतंकी शामिल हैं।
पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से हटाना उसकी गिरती अर्थव्यवस्था के लिए मनोबल बढ़ाने का काम करेगा, साथ ही उसके आयात, निर्यात, प्रेषण और अंतरराष्ट्रीय ऋण तक पहुंच की सीमा को भी बढ़ावा देगा। ग्रे लिस्ट से बाहर हटने से उसकी छवि कुछ हद तक सुधर सकती है, क्योंकि वह जिहादियों के प्रति अपने कुख्यात प्रेम के कारण भारत और अमेरिका जैसे कई राष्ट्रों के निशाने पर रहेगा। पाकिस्तान ने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकट का सामना किया है, इसलिए उसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से मदद की सख्त जरूरत है।
एफएटीएफ के फैसले से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री खुश हैं और इसका श्रेय ले रहे हैं, इससे उनकी सरकार को राजनीतिक लाभ मिलेगा, खासकर जब पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान उनकी सरकार के खिलाफ निरंतर हमलावर हैं। एफएटीएफ द्वारा पाक की आतंकवाद को वित्तीय सहायता देने वाले राष्ट्र के रूप में ब्रांडिंग के बाद चीन को छोड़कर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश शून्य हो गया था, लेकिन एफएटीएफ के ताजा फैसले से निवेशकों को प्रोत्साहन मिलेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि एफएटीएफ द्वारा दी गई क्लीन चिट के बाद विभिन्न देशों के निवेशक पाकिस्तान की कुख्याति से नहीं डरेंगे, क्योंकि आतंकवाद से संबंधित तनाव कम होने पर व्यापार करने का जोखिम कम हो जाता है। पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए एफएटीएफ के 39 सदस्यों में से अधिकांश पाकिस्तान पर निगरानी रखेंगे कि वह अपनी धरती से आतंकवादियों को प्रोत्साहित न करे। पाकिस्तान सरकार ने निश्चित रूप से सीमा पार आतंक को कम किया है, लेकिन जैश-ए मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर की स्वतंत्रता बताती है कि वह आतंक के वित्तपोषण को नियंत्रित करने के लिए आधे-अधूरे कदम उठा रही है।