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खेती संकट नहीं, समाधान है

Thu, 31 Aug 2017 09:41 AM IST
देविंदर शर्मा
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कृषि
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वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान ने लगभग एक वर्ष पूर्व वैश्विक भूख सूचकांक जारी किया था, जिसमें भूख और कुपोषण का सामना करने वाली आबादी के अनुपात में देशों को रैंकिंग प्रदान की गई थी। 118 विकासशील देशों की सूची में भारत का स्थान 97वां था, जो पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी पड़ोसी देशों से बदतर है।
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हमेशा की तरह अखबारों में इससे संबंधित खबरें और संपादकीय प्रकाशित हुईं और फिर इसे भुला दिया गया। बहुत कम लोग जानते होंगे कि पहली बार जब 2006 में वैश्विक भूख सूचकांक जारी किया गया था, तो 119 देशों की सूची में भारत का स्थान 96वां था। कहने का तात्पर्य यह कि पिछले ग्यारह वर्षों में भूख और कुपोषण के मामले में कुछ भी नहीं बदला। भूख से निपटने में भारत का प्रदर्शन खराब ही हुआ है।

लेकिन राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो के सर्वेक्षण के बाद जारी रिपोर्ट इससे भी बड़ा झटका है। इस सर्वेक्षण से उस कठोर सच्चाई का पता चलता है, जिसे देश सुनना नहीं चाहता है। ग्रामीण भारत चालीस साल पहले की तुलना में कम खा रहा है। इससे संबंधित मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक, 1975-79 की तुलना में अब ग्रामीण भारतीय औसतन कम 550 कैलोरी, 13 ग्राम प्रोटीन, पांच मिग्रा लौह, 250 मिग्रा कैल्सियम और करीब 500 मिग्रा कम विटामिन ए का उपभोग करते हैं।
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तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चे औसतन रोजाना मात्र 80 मिली दूध का सेवन करते हैं, जबकि उन्हें 300 मिली दूध की जरूरत होती है। उसी सर्वेक्षण का आंकड़ा बताता है कि 35 फीसदी ग्रामीण पुरुष एवं स्त्रियां अल्पपोषण के शिकार पाए गए, जबकि 42 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं। दरअसल दक्षिण एशिया में कुपोषण का स्तर उप-सहारा अफ्रीकी देशों से दोगुना हो गया है। ग्रामीण भारत देश की आबादी का 70 फीसदी हिस्सा है, जहां 85 करोड़ लोग रहते हैं, इसलिए मुझे लगा कि इस पर क्यों नहीं संसद का मध्य रात्रि का सत्र आयोजित किया जाता। आखिरकार कोई भी लोकतंत्र बढ़ती भूख और कुपोषण को दबा नहीं सकता।
 
अगले पांच वर्षों में 2022 तक जिन छह लक्ष्यों को हासिल करने की प्रधानमंत्री ने घोषणा की है, उनमें भूख और कुपोषण उन्मूलन भी शामिल है। उनसे पहले के प्रधानमंत्री भी कुपोषण के बढ़ते दानव से अनजान नहीं थे। पूर्व प्रधानमंत्रियों- इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' अभियान चलाया था, अटल बिहारी वाजपेयी ने भूख के लिए बदनाम कालाहांडी को खाद्य का कटोरा बनाने का वायदा किया था, मनमोहन सिंह ने तो कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म तक बताया था।

मुझे याद है कि पहली बार सेंट्रल हॉल में भाजपा संसदीय दल की बैठक को संबोधित करते हुए भावुक होकर नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार को गरीबों को समर्पित किया था। उनकी सरकार के कई कार्यक्रम गरीबों तक पहुंच बनाने के उद्देश्य से शुरू किए गए हैं, जिनमें बैंकिंग व्यवस्था के बाहर 58 फीसदी आबादी के लिए जन-धन खाते खुलवाना भी शामिल है। स्किल इंडिया (कौशल भारत) जैसे कार्यक्रमों का परिणाम अभी आना बाकी है। लेकिन सबसे चिंता की बात ग्रामीण आबादी का थोक के भाव में शहरी क्षेत्रों की पलायन की प्रवृत्ति है।

इस बीच 1972 में स्थापित राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो को 2015 में भंग कर दिया गया। इससे राष्ट्र कभी यह नहीं जान पाएगा कि पोषण लक्ष्य हासिल हुआ या नहीं। आर्थिक विकास हर छह महीने पर मापा जाता है, जबकि पोषण सर्वेक्षण दस वर्षों पर होता है। फिर भी यह सरकार को पसंद नहीं है, क्योंकि यह आर्थिक विकास की कहानी के स्याह पहलुओं को उजागर करता है।

जब तक कृषि पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक गरीबी, भूख और कुपोषण उन्मूलन संभव नहीं है। एक ताजा अमेरिकी अध्ययन ने यह साबित किया है कि शहरी सेबुनियादी ढांचों के निर्माण में किए गए निवेश की तुलना में कृषि में निवेश गरीबी उन्मूलन में पांच गुना ज्यादा प्रभावी होता है। मेरी समझ से यह एक महत्वपूर्ण खोज है, जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि भारतीय अर्थशास्त्री, नीति निर्माता और नौकरशाही वैचारिक रूप से बाजार सुधार के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसलिए वे व्यवस्थित ढंग से कृषि और सामाजिक क्षेत्र में निवेश को घटाने में व्यस्त हैं।

मेरा हमेशा से मानना रहा है कि जो लोग संकट के लिए जिम्मेदार हैं, उनसे आप समाधान की अपेक्षा नहीं कर सकते। 71 कृषि विश्वविद्यालयों और 200 से ज्यादा शोध संस्थानों/ ब्यूरो पर निगरानी रखने वाला भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद इसका क्लासिक उदाहरण है। इसके अलावा समय-समय पर नीति आयोग द्वारा आर्थिक नुस्खे जारी किए जाते हैं और इससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि कृषि को संकट में डालने वाली विफल नीतियों को प्रमुखता से जगह दी गई है।

अल्बर्ट आइंस्टाइन ने भी कहा था कि जिस सोच ने समस्याओं को जन्म दिया, उसी सोच से हम उनका समाधान नहीं कर सकते। चाहे वह आर्थिक सर्वेक्षण हो, या नीति आयोग का अगले तीन वर्षों के लिए विजन और रणनीति दस्तावेज या किसानों की आय दोगुनी करने पर विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट, सबमें जोर उसी रणनीति पर जिसने वास्तव में कृषि संकट को बढ़ाया है। बहस हमेशा एक ही सिद्धांत के आसपास घूमती है- बढ़ती फसल उत्पादकता, सिंचाई का विस्तार, फसल बीमा और इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार मंच को मजबूत बनाना। अगर यह सच है, तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि अन्न का कटोरा कहा जाने वाला पंजाब किसान आत्महत्या का प्रमुख केंद्र बने। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब वहां दो या तीन किसान आत्महत्या न करते हों।

गरीबी, भूख और कुपोषण से रक्षा कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने से ही होगी। अतीत की गलतियों से सबक सीखने और प्रधानमंत्री के सपनों को साकार करने का यही वक्त है। यह निश्चित रूप से संभव है, लेकिन उसी त्रुटिपूर्ण सोच से नहीं, जिसने संकट को बढ़ाया है।
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