ये जो हमारे देश के किसान हैं न, बहुत ही तेज हैं। किसी के कहने में नहीं आते। खासकर उद्योगपतियों को तो ये ‘चलाते’ रहते हैं। यही कारण है कि आज देश में सब जगह खेत ही खेत नजर आ रहे हैं और उद्योग कहीं-कहीं। हाथ ही नहीं रखने देते हैं ये किसान।
हरित क्रांति की बात चली, तो ये खुशी से शामिल हो गए, मगर जब उद्योगों को जमाने की शुरुआत की, तो जमीन से यों चिपक गए, जैसे चिपको आंदोलन। हमारे उद्योगपति भले ही सब जानते हों, मगर किसान से डील करना उन्हें नहीं आता। इसी जगह वे हाथ टेक देते हैं और सरकार की तरफ हाथ बढ़ा देते हैं। सरकार भी क्या करे। अपने पास जो बेकार जमीन पड़ी रहती है, उसे ही तो दे सकती है। दे देती है।
जमीन ही नहीं, टैक्स की छूट, बिजली-पानी और बैंकों से करोड़ों के कर्ज, मगर कुछ ही समय बाद न तो उद्योग रहता है, न उद्योगपति। वह किसी और राज्य में चला जाता है और वहां फिर से नया उद्योग चलाने की जुगत करता है। ऐसे में भारत-परिक्रमा पूरी हो जाती है और वह करोड़ों का कर्ज सिर पर लेकर विदेश चला जाता है।
ये किसान समझते क्यों नहीं कि उपजाऊ खेतों में ही उद्योग फलता-फूलता है। लाख-दो लाख की फसल अगर इन खेतों से ले भी ली, तो क्या हासिल कर लिया। यदि उद्योगपति इतनी जमीन पर करोड़ों के वारे-न्यारे करने को तैयार हैं, तो किसानों को मदद क्यों नहीं करना चाहिए? देश के भले के लिए क्या जमीन का लंगोटी बराबर टुकड़ा भी नहीं दे सकते ये किसान? जो जमीन हीरे-मोती उगलने को तैयार बैठी है, वहां गेहूं-चना उगाने का क्या मतलब?
इसी नासमझी की वजह से भारत का किसान कर्ज में आंख खोलता है, मगर पूरी उम्र उसकी आंख नहीं खुलती। बस मुंह फाड़ता रहता है। मांगने की आदत पड़ जाए, तो कमाने की इच्छाशक्ति खत्म हो जाती है। उद्योगपतियों की तरफ से यदि हजार रुपये एकड़ की बात आती है, तो किसान डेढ़ हजार मांगने लगता है। बताइए, इतनी कीमत देकर कोई उद्योग कैसे लगा सकता है!
सरकार को किसानों की यह चाल समझ में आ गई है, इसलिए वह अब खुद किसानों से जमीन खरीद कर बेचारे उद्योगपतियों के हवाले कर रही है। वरना ये किसान तो उद्योगपतियों को लूट ही लेते। अब दुनिया देख रही है कि कैसे जहां कभी खेत-दर-खेत हुआ करते थे, वहां आज उद्योग ही उद्योग हैं, और उनसे निकलता धुआं इलाके की संपन्नता की इबारत आसमान पर लिख रहा है।