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विकास के दुष्चक्र में किसान

Mon, 26 Nov 2012 07:47 PM IST
सुनील
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बीते दिनों जब पूरा देश दीपावली का त्योहार मनाने में मग्न था, तब देश के कम से कम तीन हिस्सों में किसान जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। पहली खबर पश्चिमी महाराष्ट्र से आई, जहां बीते 12 नवंबर यानी दीपावली से ठीक एक दिन पहले सांगली, कोल्हापुर और अन्य जिलों में गन्ने की बेहतर कीमत के लिए आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें दो किसान मारे गए, दर्जनों घायल हुए और सैकड़ों जेल भेज दिए गए।
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दूसरी दुखद खबर महाराष्ट्र के ही विदर्भ क्षेत्र से आई, जहां उसी दिन तीन किसानों ने आत्महत्या कर ली। विदर्भ देश में किसान आत्महत्याओं का केंद्र बन चुका है, जहां लगातार कई वर्षों से बड़ी संख्या में किसान खुदकुशी कर रहे हैं। इन तीन किसानों की आत्महत्या के बाद वहां खुदकुशी करने वाले किसानों की संख्या 644 पर पहुंच गई है। तीसरी खबर मध्य प्रदेश के कटनी जिले से आई, जहां के किसान एक कंपनी के ताप-बिजली कारखाने के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे।

वे काफी समय से खेतों में चिता सजाकर बैठे हुए थे और सरकार को चेतावनी दे रहे थे। प्रशासन ने चिता सत्याग्रह कर रहे किसानों पर दबाव बढ़ाया, तो ठीक दीवाली के दिन एक किसान महिला ने आत्महत्या कर ली। जब किसानों ने उसकी लाश को रखकर आंदोलन शुरू कर दिया, तो पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया, जिसके बाद एक आदिवासी युवक ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की।
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ये तमाम घटनाएं हमारे देश की खेती और किसानों पर छाए गहरे संकट की ओर इशारा करती हैं। विकास और वृद्धि के जिस रास्ते पर, खासकर आर्थिक उदारीकरण के बाद, हमारी सरकारें चल रही हैं, उसमें बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल करके खेती की जमीन हड़पी जा रही है। चूंकि रोजगार और जीविका के अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए जहां भी वे संगठित हो पाते हैं, इसका विरोध करते हैं। यह उनके लिए अस्तित्व की लड़ाई बन जाती है।

जहां सीधे किसानों की जमीन नहीं ली जा रही है, वहां भी किसानों पर मुसीबत छाई है। हरित क्रांति के दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं। ऊपर से अनुदान कम करने के आग्रहों और मुक्त व्यापार वाले आर्थिक सुधारों ने खेती को तेजी से घाटे का पेशा बना दिया है। इसीलिए गन्ने के बेहतर दामों का सवाल पश्चिमी महाराष्ट्र के किसानों के लिए जीवन-मरण का  सवाल बन गया है।

खेती-किसानी का यह संकट बहुत गहरा और बुनियादी है। बड़ी तादाद में किसानों की आत्महत्याओं में भी यह दिखाई देता है। सरकारी आंकड़ों पर ही गौर करें, तो वर्ष 1995 से लेकर 2011 तक हमारे देश में लगभग दो लाख 71 हजार किसान खुदकुशी कर चुके हैं। यानी हर साल औसतन 16 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। रोज 44 किसान देश के किसी न किसी कोने में आत्महत्या करते हैं। विडंबना यह है कि खेती और किसानों के गहराते संकट के बावजूद उन आर्थिक नीतियों और विकास के उस मॉडल को लेकर कोई पुनर्विचार नहीं हो रहा है, जिनके कारण यह संकट पैदा हुआ है। बल्कि सरकार आंख मूंदकर उसी रास्ते पर आगे बढ़ने पर आमादा है।

इसकी एक ताजा मिसाल रंगराजन समिति की रपट है, जो गन्ना और चीनी उद्योग को नियंत्रणमुक्त करने के विषय में आई है। सी. रंगराजन प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख हैं और कथित आर्थिक सुधारों के प्रबल हिमायती भी। उनकी अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति ने पिछले दिनों चीनी उद्योग को पूरी तरह नियंत्रणमुक्त करने संबंधी सिफारिश प्रधानमंत्री से की है।

यदि ये सिफारिशें मान ली गईं, तो देश के किसानों के लिए एक बड़ा आघात होगा। समिति की सिफारिशों के मुताबिक, राज्य सरकारों द्वारा गन्ने का समर्थन मूल्य घोषित करने की व्यवस्था खत्म कर देनी चाहिए और गन्ने की कीमतें मिलों और किसानों के बीच तय होनी चाहिए। यदि ऐसा हुआ, तो गन्ने की कीमतें एक झटके में नीचे आ जाएंगी।

किसान सामान्यतः असंगठित, लाचार और गरीब होते हैं, इसलिए वे मिल मालिकों से सौदेबाजी नहीं कर पाएंगे। क्या विडंबना है कि देश में हर जगह जहां किसान गन्ने का समर्थन-मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार की तैयारी उसे कम करने या खत्म करने की चल रही है। रंगराजन समिति की रिपोर्ट देश में कई किसान आंदोलनों और कई नए गोलीकांडों को जन्म दे सकती है।

चीनी उद्योग पर वर्तमान में कई बंदिशें हैं, जैसे राशन के लिए 10 फीसदी चीनी की लेवी, चीनी को बाजार में जारी करने पर नियंत्रण, चीनी के आयात-निर्यात पर सरकार का नियंत्रण आदि। रंगराजन समिति ने इन तमाम बंदिशों को हटाने की सिफारिश की है। इसलिए देश के चीनी मिल मालिक उनकी इस रिपोर्ट से बहुत खुश हैं और इसे जल्दी से जल्दी लागू करने की मांग कर रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ जिलों में हुए गोलीकांड से तीन-चार दिन पहले ही मिल मालिक संघ ने दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता करके कहा था कि रंगराजन रिपोर्ट लागू होने से उनको 3,000 करोड़ रुपये का फायदा होगा।

चीनी मिल मालिकों के उत्साह और पश्चिमी महाराष्ट्र के गोलीकांड में एक रिश्ता भी हो सकता है, क्योंकि देश के खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार उसी इलाके के हैं और चीनी मिलों की लॉबी से उनकी नजदीकी जगजाहिर है। रंगराजन समिति की सिफारिशें लागू करने में उन्हें मुश्किल न हो, इसलिए किसानों को 'सबक' सिखाना उन्हें जरूरी लगा होगा। यदि वैश्वीकरण-उदारीकरण से प्रेरित आर्थिक सुधारों की गाड़ी इसी तरह आगे बढ़ती गई, तो देश में किसानों के लिए मुसीबतें बढ़ती ही जाएंगी और खेती का संकट और गहरा जाएगा।
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