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भ्रामक दुष्प्रचार से किसान बुरी तरह आशंकित, सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत उठा रहे हैं ये सवाल

त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड Published by: त्रिवेंद्र सिंह रावत Updated Sat, 19 Dec 2020 06:16 AM IST
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किसानों का आंदोलन - फोटो : पीटीआई

किसान हितों को सर्वोपरि रखने वाली केंद्र की भाजपा सरकार किसानों के साथ बातचीत कर उनकी शंकाओं का समाधान निकालने को तैयार है। यह भरोसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सभी केंद्रीय मंत्री और भाजपा शासित राज्यों के सभी मुख्यमंत्री किसानों को दे चुके हैं। लेकिन विडंबना यह है कि कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों द्वारा कृषि कानूनों को लेकर किए जा रहे भ्रामक दुष्प्रचार ने किसानों को बुरी तरह आशंकित कर दिया है। किसानों की इन्हीं आशंकाओं की आड़ में ये दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं और न केवल कृषक वर्ग को, बल्कि देश की समूची अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने का काम कर रहे हैं। हम सब जानते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरा देश लॉकडाउन की वजह से बंदी में था, तब यही किसान पसीने में लथपथ खेतों में डटे थे। किसानों की इसी मेहनत ने पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था को और नीचे गिरने से बचाया था। केंद्र की मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की शुरुआत से ही खेती-किसानी प्रधानमंत्री की वरीयता में रही है। किसानों की आमदनी को दोगुना करने से लेकर उनकी पैदावार का उचित मूल्य दिलाने तक के लिए मोदी सरकार निरंतर नीतिगत निर्णय लेती रही है। नए कृषि कानून भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उसी वरीयता की कड़ी हैं, जो किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम हैं।



कृषि कानूनों को लेकर मूल रूप से तीन प्रकार की आशंकाएं उपजी हैं। पहला एमएसपी को लेकर है। दूसरी प्रमुख आशंका कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर है, जिसके तहत किसानों के तथाकथित समर्थक बने कांग्रेस और विपक्षी दल यह भ्रम फैला रहे हैं कि इससे बड़ी कंपनियां उनकी खेती की जमीन पर कब्जा कर लेंगी। तीसरी आशंका मंडी कानून में बदलाव को लेकर है, जिसमें मंडी से बाहर अपनी फसल बेचने की अनुमति दी गई है। दरअसल ये तीनों प्रावधान किसानों की आय में वृद्धि से सीधे सीधे जुड़े हैं। लेकिन जिस कांग्रेस ने खुद इन प्रावधानों की पहल की, आज वही अपनी सोच से पीछे हट रही है और किसानों को बरगलाकर उनकी तरक्की के रास्ते में बाधा बन रही है। कांग्रेस ने अपने पिछले चुनाव घोषणापत्रों में भी कृषि सुधार कानून का वादा किया था। उसके साथ-साथ अन्य राजनीतिक दल जो मूल रूप से भाजपा के विरोधी हैं, वे भी किसानों को भरमाने की कांग्रेस की मुहिम में उसके साथ जा खड़े हुए हैं। 


दरअसल एमएसपी के मुद्दे पर सबसे अधिक पंजाब और हरियाणा के किसानों के बीच आशंका है। केंद्र सरकार पर खाद्य सुरक्षा कानून के तहत हर साल गेहूं और धान की खरीद करने का दायित्व है। यह खरीद दोनों फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर होती है। यहां यह समझने की आवश्यकता है कि केंद्रीय पूल में इन दोनों फसलों की सर्वाधिक खरीद पंजाब और हरियाणा से ही होती है। ऐसा कई बार देखने में आया है कि इन दोनों राज्यों से यहां अनुमानित पैदावार से अधिक की खरीद हुई है। इसलिए इन दोनों राज्यों के किसानों में इस आशंका का पैदा होना वाजिब हो सकता है। लेकिन किसानों को यह भी समझना होगा कि केंद्र सरकार लगातार इस बात का भरोसा दे रही है कि एमएसपी की व्यवस्था समाप्त नहीं होगी। 


एमएसपी वैसे भी इन कानूनों का हिस्सा नहीं है। ऐतिहासिक तौर पर सरकार सीएसीपी की सिफारिशों के आधार पर 23 फसलों का एमएसपी तय करती रही है। यही व्यवस्था आगे भी जारी रहेगी। मेरा तो मानना है कि किसानों को विपक्षी दलों के ऐसे किसी भ्रम में आने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें यह समझना होगा कि केंद्र सरकार ने पिछले छह वर्षों में किसानों के लिए कितने सकारात्मक कदम उठाए हैं। यही स्थिति मंडी कानून में बदलाव को लेकर भी है। कांग्रेस खुद इस प्रस्ताव को लेकर आई और शरद पवार ने तो राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कानून में बदलाव करने को लेकर पत्र भी लिखे। इस कानून के तहत किसानों को अपनी पैदावार बेचने के अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे, जिससे वे अपनी फसल का मूल्य भी तय करने में भी सक्षम होंगे। और जहां तक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर कांग्रेस की तरफ से प्रश्न खड़े करने की बात है, उसे पहले यह बताना चाहिए कि यह व्यवस्था किसी न किसी रूप में आज भी चल रही है। कई बड़ी कंपनियां अपनी पसंद की पैदावार का सौदा किसानों से पहले से ही कर रही हैं। इसमें जमीन पर कब्जा करने की बात अब तक नहीं हुई है। देश के कानून इसे रोकने में पूरी तरह सक्षम हैं और किसानों के हित में हैं। 


किसान हमेशा से प्रधानमंत्री की सोच के केंद्र में रहे हैं। यही वजह है कि केंद्र का कृषि बजट पांच साल में 12,000 करोड़ रुपये से बढ़कर आज 1,34,000 करोड़ रुपये को पार कर गया है। केंद्र सरकार ने किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य ही नहीं रखा है, बल्कि कृषि के बजट को भी उसके अनुरूप बढ़ाया है। किसानों के हितों में आज अचानक आवाज उठाने वाली कांग्रेस को यह पता होना चाहिए कि भाजपा शासित राज्यों में किसानों के लिए किस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं। उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने गन्ना किसानों के बकाया का शत-प्रतिशत भुगतान किया है। वह भी पेराई सीजन शुरू होने से दो महीने पहले। इसके अतिरिक्त किसानों को तीन लाख रुपये तक और स्वयं सहायता

समूहों को पांच लाख रुपये तक का ऋण बिना ब्याज उपलब्ध कराया जा रहा है। इस योजना के तहत अभी तक चार लाख से अधिक किसानों और 1,330 समूहों को 2,062 करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया है। किसानों के हितों में उठाए गए प्रदेश सरकार के कदमों की तारीफ ब्रिटेन के किसानों ने भी की है। वे भी इस मामले में हमारा समर्थन कर रहे हैं।

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