प्याज और किसान का रिश्ता ब्याज और मूल जैसा अटूट है। प्याज का भाव कम होता है, तो किसान आत्महत्या करता है और प्याज के दाम चढ़ते हैं, तो किसान भूखा मर जाता है। सही बात तो यह है कि किसान को सिर्फ प्याज उगाना आता है, खाना नहीं। वे सब्जी या दाल की तरह प्याज को उपयोग में लाने लगते हैं...और आप तो जानते ही हैं कि देश की बड़ी आबादी खेती में लगी है, जो सिवा प्याज-रोटी के कुछ नहीं खाती। ऐसे में प्याज के भाव तो बढ़ने ही हैं।
पढ़े-लिखे, शहरी, समझदार तो प्याज का सब्जी में सोच-समझकर उपयोग करते हैं, इसलिए उन्हें प्याज कम लगता है और थोड़ा महंगा भी हो, तो खरीद सकते हैं, मगर किसानों के साथ बड़ी दिक्कत है। वे पूरी रोटी प्याज से खाते हैं।
अपने देश का किसान कर्ज में जन्म लेता है, प्याज के सहारे जिंदा रहता है और कर्ज में ही मर जाता है। यह बात अगर हमारे पूर्वज कह गए हैं, तो आशय यही था कि कर्ज में मर जाओ। लेकिन आजकल के किसान न जाने किस मिट्टी के बने हैं कि कर्ज देखकर आत्महत्या करने को उतावले हो जाते हैं। दो-चार लाख का कर्ज भी कोई कर्ज होता है भला। देखो हमारे शहर के धन्ना सेठों को। करोड़ों का कर्ज है, मगर चेहरे पर शिकन भी नहीं आती। किसानों को हिम्मत से काम लेना चाहिए। कर्ज ऐसा मर्ज नहीं है, जिसका आपके मरते ही इलाज हो जाए और अगर हो भी गया, तो अगली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे...कद्दू!
कर्ज किसी के मरने का कारण हो ही नहीं सकता। क्या भारत सरकार पर कर्ज नहीं है? क्या एक भी पैसा कर्ज न लेने वाला आम भारतीय इस कर्ज से मुक्त है? मुझे तो यही समझ में नहीं आता कि किसान को हर दिन मरना पड़ता है, तो वह आत्महत्या कैसे कर लेता है। उनका तो कुछ नहीं जाता, सरकार फोकट में बदनाम हो जाती है।
किसानों को कर्ज से छुटकारा दिलाने के लिए जरूरी है कि उन्हें प्याज का संक्षिप्त उपयोग बताया जाए। समझाया जाए कि प्याज को रोटी के साथ नहीं खाना चाहिए। उसे सब्जी या दाल में डालकर खाना चाहिए। इस तरह से उतना प्याज तो बचाया ही जा सकता है, जितना कि हम पाकिस्तान से ला रहे हैं।
प्याज का महत्व समझाने के लिए देशप्रेम का हवाला भी दिया जा सकता है। प्याज के बगैर सिर्फ रोटी से भी पेट भरकर देंखे। वैसे अगर किसान अपना प्याज खाने के बजाय बेच दे, तो उसका सारा कर्ज ही उतर जाए...मगर उसे समझाए कौन!