हाल ही में विधि आयोग ने अपनी सिफारिश में कहा है कि हिंदू कानून में संशोधन होना चाहिए। अगर पति अपंग है, अक्षम है, साधु हो गया है, तो उसकी पत्नी के भरण-पोषण का दायित्व ससुर का होगा। हां, अगर पति को जायदाद में हिस्सा मिल चुका है, तो फिर पत्नी उस जायदाद से गुजारा करे। सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है, लेकिन क्या इस देश में हर एक के पास जमीन-जायदाद है? सच तो यह है कि यहां अधिकांश लोग इतना ही कमा पाते हैं कि दो वक्त की रोटी नसीब हो जाए। फिर जिस पिता ने अपनी उम्र गुजार ली, वह बुढ़ापे में क्या इतना सक्षम होगा कि बेटे के परिवार का भी भरण-पोषण कर सके। या कि यह बात सिर्फ उन पर लागू होगी, जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। दरअसल, हमारे देश में इस समय दो प्रकार की बातें काम कर रही हैं। एक ओर एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है, जिनमें किसी बुजुर्ग की कोई जगह नहीं होती है। दूसरी ओर, जब भी किसी कानून को बनाने की बात की जाती है, तो उसे संयुक्त परिवार के चश्मे से देखने की कोशिश होती है।
इससे पहले भी पूर्व केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ पति की तनख्वाह में से पत्नी को आधी तनख्वाह देने की बात कर चुकी हैं। उनका कहना था कि पत्नी घर का जो काम करती है, यदि उसके लिए नौकर रखेंगे, तो उन्हें भी तो पैसे देने पड़ेंगे। कृष्णा तीरथ ने मान लिया था कि इस देश में हर आदमी नौकर रख सकता है। कई पश्चिमी देशों में ऐसे कायदे हैं। लेकिन यदि पति के वेतन से आधा पत्नी को दे भी दिया जाए, तो उससे घर की आर्थिक स्थिति में क्या फर्क पड़ेगा, यह सोचने की बात है। औरतों की स्थिति सुधरे, वे मजबूत हों, यह हम सभी चाहते हैं। मगर सिर्फ कानून के आधार पर समस्याओं से निजात पाई जा सकती, तो अब तक दहेज का नामोनिशां मिट गया होता, दुष्कर्म गए जमाने की बात होता और गर्भ में लड़की को मारने के बारे में कोई न सोचता।
हमारे यहां बिना सोचे-समझे कई फरमान हवा में छोड़ दिए जाते हैं। इन्हीं में से एक था, तलाक की स्थिति में लड़की को ससुराल की जायदाद में हक मिले। लड़की को माता-पिता की जायदाद में बराबर के हक का प्रावधान है। मगर माता-पिता जब संपत्ति का बंटवारा करते हैं, तो कभी लड़की के बारे में सोचते तक नहीं। लेकिन अब वही हक की जिम्मेदारी ससुराल वालों पर डाली जाए, तो इसे न्यायसंगत कहेंगे? जिस जायदाद में न बहू का, और न उसके पति का कोई श्रम या पैसा लगा है, उसके ऊपर कानूनन हक जताना कैसे ठीक हुआ?
नहीं कहा जा सकता कि इन सिफारिशों से लड़की का कितना भला होगा? मगर यह जरूर है कि परिवार सिर्फ एक तरफ की बात करने से नहीं चल सकता। एक लड़का अगर शादी करे, तो वह और उसका परिवार ही हर बात के लिए जिम्मेदार बना दिया जाए, यह ठीक नहीं है। हर परिवार एक रणक्षेत्र हो, हर जोड़ा वकीलों और पुलिस के सामने बैठा रहे, तो इससे बेहतर है कि शादी ही न की जाए। आज से बीस साल पहले इस लेखिका के एक परिजन ब्रिटेन में थे। उन्होंने बताया था कि वहां बड़ी संख्या में लड़के शादी ही नहीं करते हैं, क्योंकि कानून ने हर जिम्मेदारी उन पर डाल रखी है। दुखद है कि हमारे नेतागण भी वहीं से पाठ पढ़कर आते हैं, और उसे लागू करने की कोशिश करते हैं।