फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

झीने आवरण में एक्जिट पोल

राजेश बादल
Updated Mon, 10 Dec 2018 07:18 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
राजेश बादल

कुछ साल पहले तक एक्जिट पोल बड़े कौतूहल से देखे जाते थे। दर्शक हैरान हो जाते थे। समझ में नहीं आता था कि एक्जिट पोल करने वालों के पास आखिर कौन-सी जादू की छड़ी है, जिसके घुमाते ही सवा सौ करोड़ की आबादी वाले मुल्क के नतीजों का सच सामने आ जाता है। कुछ चुनावों में तो करीब-करीब वही परिणाम आते रहे, जो एक्जिट पोल में बताए जाते थे। अचानक घटनाक्रम बदला। ऐसा भी हुआ कि इसमें जो संकेत दिए गए, वे परिणामों से एकदम उलट थे। जो एक्जिट पोल नब्बे फीसदी तक सटीक आकलन करते आ रहे थे, वे लिटमस टेस्ट में अनुत्तीर्ण कैसे होने लगे? यहां तक कहा जाने लगा कि एक्जिट पोल कराने वाली एजेंसियों को भी 'मैनेज' किया जाता है। एक्जिट पोल का तिलिस्म टूटा क्यों?



दरअसल यह काम करने वाली संस्थाओं की आर्थिक सेहत पहले बहुत अच्छी थी। पर वैश्विक मंदी का असर टेलीविजन चैनलों तथा मीडिया घरानों पर भी देखने को मिला। एक्जिट पोल एजेंसियों की फीस मीडिया मालिकों को फिजूलखर्ची लगने लगी। ऐसे में, एक तो मीडिया घरानों ने अपने सर्वेक्षण कराने आरंभ कर दिए और दूसरे, एक्ज़िट पोल एजेंसियों ने भी शुल्क कम कर दिए। नुकसान दोनों को हुआ। कम बजट में सर्वेक्षण कराने के लिए मजबूर एजेंसियों ने इसका आकार घटा दिया। उन्होंने इस बात को भी प्राथमिकता दी कि उनका सर्वेक्षक कम पैसे में अधिक लोगों का फीडबैक कैसे ले सकता है। इससे विविधताओं से भरे भारतीय समाज की समग्र तस्वीर एक्जिट पोल में नहीं आ पाई।


मीडिया घरानों का अपना सर्वेक्षण कराने का फैसला भी खतरे से खाली नहीं था। चैनलों ने एक्जिट और ओपिनियन पोल अपनी रिसर्च टीम के भरोसे शुरू किए। इस टीम ने मैदानी दौरे करने के बजाय अपने नेटवर्क का सहारा लिया। जिलों तथा तहसीलों में काम करने वाले स्ट्रिंगर्स को एक्जिट पोल के लिए रायशुमारी का जिम्मा सौंपा गया। स्ट्रिंगर अपने सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और कारोबारी सरोकार के चलते अक्सर निष्पक्ष राय नहीं दे पाते। एक्जिट पोल का सर्वे इसी चरण में झटका खा जाता है। चैनलों की रिसर्च टीम को सारे मर्ज की दवा मान लिया गया है। पर इस टीम के सदस्य न तो एक्जिट-ओपिनियन पोल के लिए प्रशिक्षित होते हैं, न उसकी  मेथेडोलॉजी जानते हैं। लोकसभा चुनाव में मीडिया घरानों ने इस मामले में सावधानी नहीं दिखाई, तो बड़ी हास्यास्पद स्थिति बन जाएगी।


सिर्फ एक उदाहरण से बात समझ में आ जाएगी। पांच राज्यों के एक्जिट पोल में छत्तीसगढ़ में कुछ चैनल कांग्रेस की बढ़त दिखा रहे हैं, तो कुछ भाजपा को। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच मतों का अंतर सिर्फ 0.75 फीसदी था। पर भाजपा को 49 और कांग्रेस को 39 सीटें मिली थीं। इस बार एक्जिट पोल में कांग्रेस की वोट बढ़त चार से सात फीसदी अधिक दिखा रहे हैं और सीटों की बढ़त में या तो कांटे की टक्कर  बता रहे हैं या फिर कांग्रेस की सिर्फ दो-चार सीटों की बढ़त बताई जा रही है। इस गणित का आधार समझ से परे है। इसके अलावा किसी भी एक्जिट पोल ने नोटा की भूमिका नहीं बताई। पिछली बार छत्तीसगढ़ में नोटा के वोट तीन फीसदी थे। उन वोटों ने दस-पंद्रह सीटों के परिणामों में उलटफेर कर दिया था। यह आश्चर्यजनक है। उन सीटों पर किस दल ने उम्मीदवार बदले और किसने सबक लिया, एक्जिट पोल इस तरह के अनेक सवालों पर चुप्पी साधे हुए हैं। हकीकत यह है कि इतनी बारीकी से ये सर्वेक्षण हुए ही नहीं। झीने पर्दे के आवरण में शरमाते-झिझकते एक्जिट पोल पेश करने से कोई फायदा नहीं है।  

विज्ञापन
विज्ञापन
Next