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मोदी-शाह के रास्ते पर फडणवीस, 'महा जनादेश यात्रा' से राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर रहे हैं

नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Wed, 04 Sep 2019 06:56 AM IST
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आदित्य ठाकरे-देवेंद्र फडणवीस-उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की 'महा जनादेश यात्रा' को राज्य में मिल रही प्रतिक्रिया के बारे में सुना था और मैं स्वयं इसे देखना चाहती थी। भाजपा के क्षितिज पर फडणवीस जिस तरह से उभर रहे हैं, संघ योगी आदित्यनाथ के साथ उन्हें भी भविष्य के संभावित राष्ट्रीय नेताओं के रूप में देख सकता है। संघ दीर्घकालीन कार्यकाल को ध्यान में रखते हुए नेतृत्व तैयार करने के बारे में विचार करता है।

इसे भाग्य या रणनीति चाहे जो कहें, जब महाराष्ट्र अक्तूबर में विधानसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, राज्य के चुनावी आकाश में फडणवीस एक मात्र नेता के रूप में उभरे हैं। वास्तव में विपक्ष में उन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं है। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो वह एक गलत जाति से आते हैं, आजादी के बाद से इस राज्य में अधिकांश समय मराठाओं के हाथ में ही कमान रही। वह नितिन गडकरी की तरह ब्राह्मण हैं और नागपुर से आते हैं, जिन्हें पीछे छोड़कर पिछली बार वह मुख्यमंत्री बने थे।



पिछले पांच वर्षों में उन्होंने अपने दम पर शासन करके अपनी क्षमता साबित कर दी, क्योंकि उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर बड़े मराठा आंदोलन को ध्वस्त किया, भीमा कोरेगांव के हिंसक आंदोलन से निपटा, राज्य के बड़े हिस्से में भीषण सूखे के बावजूद किसानों को भरोसा दिया और अब भाजपा में शामिल होने के लिए कांग्रेस एवं राकांपा नेताओं की भीड़ लगी है। भाजपा द्वारा प्रवेश पर फिल्टर के चलते कुछ लोग शिवसेना में चले गए हैं और कुछ जाने की प्रक्रिया में हैं। जहां तक राकांपा नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल का मामला है, वह शिवसेना में शामिल होने के लिए बिल्कुल तैयार हैं।

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आदित्य ठाकरे-देवेंद्र फडणवीस-उद्धव ठाकरे (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की 'महा जनादेश यात्रा' को राज्य में मिल रही प्रतिक्रिया के बारे में सुना था और मैं स्वयं इसे देखना चाहती थी। भाजपा के क्षितिज पर फडणवीस जिस तरह से उभर रहे हैं, संघ योगी आदित्यनाथ के साथ उन्हें भी भविष्य के संभावित राष्ट्रीय नेताओं के रूप में देख सकता है। संघ दीर्घकालीन कार्यकाल को ध्यान में रखते हुए नेतृत्व तैयार करने के बारे में विचार करता है।

इसे भाग्य या रणनीति चाहे जो कहें, जब महाराष्ट्र अक्तूबर में विधानसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, राज्य के चुनावी आकाश में फडणवीस एक मात्र नेता के रूप में उभरे हैं। वास्तव में विपक्ष में उन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं है। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो वह एक गलत जाति से आते हैं, आजादी के बाद से इस राज्य में अधिकांश समय मराठाओं के हाथ में ही कमान रही। वह नितिन गडकरी की तरह ब्राह्मण हैं और नागपुर से आते हैं, जिन्हें पीछे छोड़कर पिछली बार वह मुख्यमंत्री बने थे।

पिछले पांच वर्षों में उन्होंने अपने दम पर शासन करके अपनी क्षमता साबित कर दी, क्योंकि उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर बड़े मराठा आंदोलन को ध्वस्त किया, भीमा कोरेगांव के हिंसक आंदोलन से निपटा, राज्य के बड़े हिस्से में भीषण सूखे के बावजूद किसानों को भरोसा दिया और अब भाजपा में शामिल होने के लिए कांग्रेस एवं राकांपा नेताओं की भीड़ लगी है। भाजपा द्वारा प्रवेश पर फिल्टर के चलते कुछ लोग शिवसेना में चले गए हैं और कुछ जाने की प्रक्रिया में हैं। जहां तक राकांपा नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल का मामला है, वह शिवसेना में शामिल होने के लिए बिल्कुल तैयार हैं।

चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही भाजपा महाराष्ट्र में जोरदार चुनावी प्रचार के मोड में आ गई है। उसने शिवसेना के साथ गठबंधन करने का फैसला किया है और शिवसेना को उप मुख्यमंत्री का पद देने को तैयार है, लेकिन अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि देवेंद्र फडणवीस ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। तीन चरणों की यात्रा के अंतिम पड़ाव में मराठवाड़ा इलाके में मुख्यमंत्री फडणवीस के साथ यात्रा करते हुए स्पष्ट महसूस हुआ कि लोगों में उनको लेकर उत्साह है।

हर जगह होर्डिंग पर पगड़ी पहने हुए उनकी तस्वीर दिखाई दे रही थी। वर्ष 2014 के विपरीत 2019 का चुनाव जितना भाजपा को लेकर हो रहा है, उससे ज्यादा फडणवीस को लेकर। इसके विपरीत महाराष्ट्र में विपक्ष ढह रहा है। फडणवीस ने विपक्षी नेताओं के गढ़ में सेंध लगाई है। शंकर राव चव्हाण का गढ़ रहे नांदेड़ में उनके बेटे अशोक चव्हाण पिछला लोकसभा चुनाव हार गए। लातुर जहां से पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल और दो पूर्व मुख्यमंत्रियों विलासराव देशमुख और शिवाजीराव निलंजकर प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, वहां उनके समर्थक भाजपा में जाने को तैयार बैठे हैं। जब तक कोई नाटकीय मोड़ नहीं आता, कांग्रेस परिवार (कांग्रेस+राकांपा) की स्थिति आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण और बड़े राज्य महाराष्ट्र में वैसी ही हो जाएगी, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल में हुई।

महाराष्ट्र में जो कुछ भी हो रहा है, वह भाजपा की बिसात पर एक छोटा हिस्सा है, हालांकि यह हर स्तर पर अपनी टीम को आगे बढ़ाने की दिशा में शीर्ष दो नेताओं की रणनीति का संकेत देता है। इस नई टीम को तैयार करने और नियुक्त करने के अलावा मोदी के दूसरे कार्यकाल से कुछ अन्य रुझान भी मिलते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने एक बड़ी भूमिका निभाने का फैसला किया है। वह अब वैश्विक नेताओं के साथ बातचीत करने, विश्व जनमत तैयार करने, भारत को 'विश्व गुरु' बनाने में जुटे हैं। वह मन की बात के जरिये बड़े मुद्दों पर लोगों के साथ संवाद जारी रखेंगे और इस प्रक्रिया में वह दिन-प्रतिदिन के शासन की गलतियों से ऊपर उठे व्यक्तित्व बन जाएंगे। यह उन्हें आर्थिक मोर्चे की गंभीर चुनौतियों या जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के नतीजों, जो अभी सामने नहीं आया है, या एनआरसी के प्रकाशन के बाद की अशांति और पूर्वोत्तर में उसके प्रभाव की समस्याओं से बचा सकता है।

हालांकि, अपनी लोकप्रियता और बेदाग छवि के कारण प्रधानमंत्री पार्टी का चेहरा बने रहेंगे और रोजमर्रा के प्रशासन में जरूरत होगी, तभी हस्तक्षेप करेंगे। अमित शाह ही अब सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए सरकार के प्रभारी प्रतीत होते हैं। कहा जाता है कि 2024 में सत्ता संभालने के लिए उन्हें तैयार किया जाएगा। हर तरह से सिर्फ तीन मंत्रालयों को छोड़कर वह सरकार के संपूर्ण कामकाज की देखभाल कर रहे हैं। एयर इंडिया को बेचने के फैसले पर उन्होंने ही मोहर लगाई। आईबी और रॉ उन्हीं को रिपोर्ट करते हैं, मोदी के पहले कार्यकाल में बेहद ताकतवर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल अब उनके साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं।

अमित शाह ने ही सरकार की तरफ से संसद में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने की दलील दी, संसद में मौजूद रहने के बावजूद प्रधानमंत्री ने इस फैसले पर कुछ नहीं बोला, जिसे 50 साल बाद याद किया जाएगा। मोदी-शाह की टीम ने बिना देर किए पार्टी के मूल एजेंडे को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अभी राम मंदिर मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है और उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उस दिशा में भी सरकार कदम बढ़ाएगी। यदि संसद के दोनों सदनों ने दो तिहाई बहुमत से अनुच्छेद 370 के खिलाफ मतदान किया, तो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विरोध करने की संभावना नहीं है।

हालांकि, सबसे ज्यादा हैरानी इस बात को लेकर है कि विपक्ष काफी तेजी से ढह रहा है। विपक्षी नेता भाजपा के खेमे में जाने के लिए पाले बदल रहे हैं, जिस तरह से सरकार ने अपने विरोधियों के खिलाफ सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का इस्तेमाल किया है, कुछ नेता जांच और मुकदमों से बचने के लिए सुरक्षा और शांति चाहते हैं। वहीं कुछ नेता इस कारण भी भाजपा में शामिल हो रहे हैं, कि अपनी पार्टी में उन्हें कोई भविष्य नजर नहीं आ रहा है। पी चिदंबरम से सीबीआई (जो कभी उनके नियंत्रण में थी) की हिरासत में पूछताछ से उनकी छवि को धक्का लगा है और इसके अपने संदेश हैं। भाजपा का बढ़ता उत्साह और उसके समांतर विपक्ष का घटता मनोबल विपक्षी नेताओं में दैनिक गिरावट के लिए जिम्मेदार है। नेतृत्वहीन विपक्ष को पता ही नहीं कि चुनौतियों का सामना कैसे करें। यहां तक कि भाजपा नेता भी निजी बातचीत में कहते हैं कि यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।
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