करीब चार दशक बाद किसी प्रधानमंत्री ने बढ़ती आबादी के प्रति चिंता जताई है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में जब आपातकाल लगाया था, तब आपातकाल की प्रतिज्ञाओं में आबादी नियंत्रण पर भी ध्यान देने की बात कही गई थी। कम बच्चे पैदा करने को भी देशभक्ति बताया गया था। उस दौरान आबादी नियंत्रण के लिए लोगों पर काफी जोर-जबर्दस्ती की गई। आपातकाल हटने पर चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी हार गईं। अरसे तक उन्हें परिवार नियोजन के नाम पर हुई ज्यादतियों के लिए याद किया जाता रहा। तब से तमाम राजनीतिक दलों ने इस मसले को उठाना ही छोड़ दिया। इसका ही नतीजा है, आज आबादी विस्फोट पर कोई दल बात नहीं करना चाहता।
अपने देश में सोच यह है कि बच्चे भगवान की देन हैं, बड़ा परिवार सुखी परिवार। यह ठीक है कि मानव पूंजी किसी देश की सबसे बड़ी संपदा होती है। लेकिन, यदि एक कमरे में क्षमता से ज्यादा लोग ठूंस-ठूंसकर भर दिए जाएं, तो आपस में ही छीन-झपट करेंगे। इस कमरे को अगर पूरा देश मान लिया जाए तो सहज ही सोचा जा सकता है कि संसाधनों के मुकाबले अगर आबादी तेजी से बढ़ती है, तो लोगों को वह सब कुछ नहीं मिलता, जो उन्हें मिलना चाहिए। इससे मामूली बातों पर लड़ाई- झगड़े बढ़ते हैं, जो आजकल दिखाई भी देते हैं।