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फेसबुक से अलग दुनिया में

Sat, 29 Jun 2013 09:42 PM IST
कैलाश वाजपेयी
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अस्तित्ववाद के जनक सॉरेन कीर्कगार्द के विषय में कहा जाता है कि उसने इक्कीस वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया और बत्तीस वर्ष की आयु तक `आइदर ऑर', `जर्नी थ्रू ड्रेड', `अनसाइंटिफिक पोस्ट स्क्रिप्ट' आदि कई ग्रंथ लिख डाले। एक सुबह जब वह जागा, तो उसने अपने को मरा हुआ पाया। इसी कीर्कगार्द ने लिखा है या यों कहें शिकायत की है कि एक कवि-लेखक वर्षों परिश्रम कर अपनी किसी गंभीर कृति का प्रकाशन करता है, जिसे कोई कम समझ वाला समीक्षक बिना उसका मर्म जाने, अपने स्तंभ में उसकी धज्जियां उड़ाकर उस कृति की महत्ता को निरस्त कर देता है।
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ऐसा ही अब फेसबुक के माध्यम से होने लगा है, जिसमें किसी ताजा आई कृति के विषय में कोई मननशील मसिजीवी फेसबुक पर अपनी विचारपूर्ण टिप्पणी लिखता है। सदाशयतायुक्त इस समझदार टिप्पणी को हजारों की संख्या में लोग पढ़ते हैं, कई जिज्ञासु भी होते हैं कि यह किस गहन चिंतक की कृति है जिसका जिक्र फेसबुक पर किया जा रहा है।  फिर शुरू होता है फेत्कार। हुंकार और फेत्कार का यह आकाशमार्गी युद्ध इतना दयनीय है कि उत्तर-प्रत्युत्तर की यह बहस अंततः अनर्गल का पर्याय बन जाती है। अस्तु, जब हम 2008 में कोलंबस एवेन्यू(न्यूयार्क) में अपने मित्र एलबर्तो के मेहमान थे, तब एल्बर्तो की संगिनी रेनाथा ने शेरिल सैंडबर्ग का नाम लिया था, जो फेसबुक की प्राक्कल्पना को साकार करने के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रही थी।

शेरिल 2004 से गूगल में कार्यरत थी। यह कहना मुश्किल है कि फेसबुक का विचार पहले मार्क जकरबर्ग के दिमाग में आया या शेरिल के। मगर इतना जरूर है कि सन् 2010 के बाद से जब से फेसबुक अंतर्जाल (इंटरनेट) में अनुष्यूत हुआ-अब शेरिल ही फेसबुक की प्रमुख हैं और नारी को जीवन के हर क्षेत्र में आधा अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ रही हैं। उसने पहले कठिन परिश्रम कर आंकड़े जुटाए और पाया कि अमरीकी स्नातकों में से साठ प्रतिशत लड़कियां लड़कों की तुलना में अधिक अंक पाती हैं। लड़कियों की प्रतिभा का आकलन करने के लिए शेरिल बीते वर्षों में भारत भी आई थीं, उसे यहां आकर पता चला कि यहां की लड़कियां तो और अधिक प्रतिभाशाली हैं। हर कहीं कार्यालयों में जब उसने शिखर पर पुरुषों को प्रतिष्ठापित देखा तो सवाल किया, क्यों? शेरिल का यह प्रश्न अमरीकी शासन व्यवस्था में गूंजा और अब वहां के कार्यालयों में अकसर `द एंड ऑफ मैन' जैसा सूत्र वाक्य प्रतिध्वनित होने लगा है।
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पीछे मुड़कर देखें, तो नारी के अधिकारों को लेकर पहली पुस्तक `द विंडीफिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ विमेन' सन् 1792 में प्रकाशित हुई थी। जिसकी लेखिका थीं मेरी वूलस्टन क्राफ्ट। दूसरी पुस्तक `द सेकेंड सेक्स' जिसे शायद सभी ने पढ़ा है सन् 1949 में आई। तीसरी पुस्तक `द फीमेल यूनक' सन् 1970 में आई। लेखिका थीं जरमेन ग्रियर। इसके बाद सन् 1991 में आई नाओमी वुल्फ की `द ब्यूटी मिथ' जो अर्से तक चर्चा में रही। नारी सौंदर्य को गौरवान्वित करने वाली विज्ञापन कंपनियां। आए दिन आयोजित होने वाली विश्व सुंदरी प्रतियोगिताएं।

नारी की देहयष्टि के साथ खिलवाड़ करने वाले धूर्त फिल्म निर्माता और फैशन के नाम पर बिकने वाले बेहूदे परिधानों से नाराज नटाशा वाल्टर ने एक पुस्तक `लिविंग डॉल्स'  का प्रकाशन लंदन से अभी बीती सदी में किया है। जहां लड़कियों को उकसाया जाता है कि देर रात तक खुले रहने वाले मदिरालयों में पोल डांसिंग करने जाएं और अच्छी रकम कमाएं। पोल डांसिंग में क्या होता है इसका विवरण देने में हम स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं। यहूदी परिवार में पली-बढ़ी शेरिल की यह पुस्तक एक तरह का आभ्यांतरिक विद्रोह है। वह कहती है कि पूरी तरह सुयोग्य होने के बावजूद लड़कियां आगे बढ़ने से झिझकती हैं कि कहीं उन्हें कर्कशा न मान लिया जाए।

कारण शायद यह है कि परिवार में जब लड़कियां बड़ी हो रही होती हैं, तो उन्हें कहा जाता है `मां की तरह सुंदरी', जबकि भाई को `पिता की तरह प्रचंड' कहकर शाबासी दी जाती है। इसी तरह शिखर पर पहुंची लड़कियों को अधपुरुष (बॉसी) कहकर उन पर ताना मारा जाता है। शेरिल इस विसंगति को `जंगल जू' नाम देती है।

यहूदी परंपरा में ईश्वर ने पुरुष के लिए जो नारी बनाई थी, उसका नाम था `लिलिथ'। `लिलिथ' पहली स्त्री थी, जिसने नारी स्वतंत्रता की आवाज बुलंद की थी। जब पुरुष ने उस पर अधिकार जमाने की कोशिश की, तो उसने कहा `हम एक ही तत्व से बने हैं, इसलिए समान हैं।' यह कहकर वह हवा में उछली और राक्षसी बन गई। अब अपने बच्चों को खाना शुरू कर दिया। निहितार्थ यह कि आदि नारी पुरुषों के लिए चुड़ैल के रूप में ग्रहण की गई है। पुरुषों की दुनिया में वह क्षुद्र है, क्रूर है, सताई जाने योग्य है। स्त्री की तस्वीर को पुरुष ने इतना तोड़ा-मरोड़ा है कि तमाम प्रगति के बावजूद वह हर पुरुष की निगाह में लिलिथ ही है। शेरिल के अनुसार पुरुष जब तक स्त्री को आधा नेतृत्व नहीं देगा, तब तक दुनिया अर्धसभ्य ही रहेगी। 
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