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इस विनाश से सबक लें!

Sat, 29 Jun 2013 09:37 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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हृदय-विदारक, साहसी, भयानक। उत्तराखंड में जारी राहत एवं बचाव कार्य की तस्वीरों को देखकर जेहन में ऐसे ही कुछ शब्द उमड़ पड़ते हैं। ड्राइंग रूम में आराम से बैठे किसी व्यक्ति के लिए जमीनी हकीकत का अंदाजा लगाना काफी मुश्किल है। मरने वालों की संख्या आधिकारिक तौर पर पहले 600 से भी कम बताई जा रही थी। खैर अब उत्तराखंड सरकार ने भी मान लिया है कि 16 जून की इस आपदा में हजारों लोग अपनी जान गवां चुके हैं। पर, वास्तव में हम नहीं जानते कि कितने लोग काल के गाल में समा गए। ऐसी ही अनिश्चितता गायब लोगों की संख्या को लेकर है। आधिकारिक आंकड़ों में यह संख्या 350 से 3,000 के ऊपर तक पहुंच चुकी है। इसमें अभी और इजाफा होने की आशंका भी बनी हुई है।
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वास्तव में, इस विपदा ने हमारे सामने भारत की बेहतरीन और बदतर, दोनों तरह की तस्वीर पेश की है। एक तरफ नेतागण बचाव कार्य का ज्यादा से ज्यादा श्रेय लेने के लिए खुलेआम आपस में लड़ रहे हैं। वहीं हमारे जवानों, चिकित्सकों, अनेक सामान्य पुरुषों एवं औरतों ने अदम्य साहस और इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है। इस विनाशलीला को देखकर भले ही हम शोक में डूबे हुए हैं, पर यह वक्त कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने का है। उत्तराखंड आपदा के अर्थ और चुनौतियां केवल राहत एवं बचाव तक ही सीमित नहीं हैं। इस हादसे ने कुछ सवाल छोड़े हैं। मसलन, इस विनाशलीला से पहले आखिर क्या हुआ था? अगर हमने इससे सीख नहीं ली तो आने वाले वक्त में किस तरह के दिन देखने पड़ सकते हैं? जैसा कि उन पिछली आपदाओं से सबक लेने में हम असफल रहे, जिसने परिवारों और समुदायों को नष्ट कर दिया था।

उत्तराखंड त्रासदी का सबसे महत्वपूर्ण सबक यही है कि विकास और पर्यावरण, दोनों अलग-अलग दुनिया से संबंधित नहीं हैं। अनेक पर्यावरणविद कह चुके हैं कि अनियोजित विकास के कारण कई बार आपदा से बहुत ज्यादा विनाश होता है। बाढ़ की वजह से कैसे इतना ज्यादा विनाश हुआ और भूस्खलन के कारण क्षेत्र की तकरीबन सभी सड़कें क्यों नष्ट हो गईं? इसके जवाब में द थर्ड पोल की रिपोर्ट में कहा गया-इसका प्रमुख कारण है खराब तरीके से नियोजित या गैर-नियोजित विकास। खासकर तीन मामलों में, पहला सड़क निर्माण, भवन निर्माण, नदी के किनारे होने वाले खनन। द थर्ड पोल हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय एवं जलवायु संकट पर चर्चा और सूचना का एक ऑनलाइन मंच है।
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इसके अलावा वहां कई जलविद्युत परियोजनाएं हैं। आर्थिक गतिविधियों के लिए उत्तराखंड की ऊर्जा जरूरतों को लेकर कोई भी सवाल नहीं उठाया जा सकता और जल एक प्राकृतिक संपत्ति है। लेकिन इन जलविद्युत परियोजनाओं के नियोजन का तरीका एक अहम मुद्दा है। इस समय गंगा की उपनदियों पर ऐसी तकरीबन 70 परियोजनाओं पर या तो निर्माण कार्य हो चुका है या फिर ऐसी योजना है। लेकिन सुनीता नारायणन जैसी पर्यावरणविद् कहती हैं कि इन परियोजनाओं के निर्माण में बहुत तेजी दिखाई जा रही है। एक पर काम खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाता है।

इसका खतरा यह है कि नदियों की दिशा में बदलाव के कारण भागीरथी का 80 फीसदी और अलकनंदा का 65 फीसदी हिस्सा प्रभावित हो सकता है। बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य के कारण सुरंग और बांध बनाने के लिए पहाड़ों में विस्फोट किया जा रहा है। इसके कारण पहाड़ ढह रहे हैं और भूस्खलन के कारण नदियों का बहाव प्रभावित हो रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि उत्तराखंड को जलविद्युत और शहरीकरण से अपने कदम पीछे खींच लेने चाहिए। लेकिन विकास परियोजनाओं के नुकसान और फायदे के बारे में सवाल पूछे जाने चाहिए और इन पर खुली चर्चा अवश्य होनी चाहिए। मतलब, संबंधित नुकसान की भरपाई कौन करेगा? और किसे इसका फायदा होगा?
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