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धन विधेयक पर आमने-सामने

Thu, 02 Mar 2017 07:39 PM IST
देवेंद्र सिंह असवाल
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देवेंद्र सिंह असवाल
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संसद से पारित आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ तथा सेवाओं का लक्षित वितरण) अधिनियम, 2016 को प्रमुख विपक्षी पार्टी ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। विपक्ष की आपत्ति इस विधेयक से नहीं, बल्कि इसे मनी बिल या धन विधेयक के रूप में पारित कराने को लेकर है। उसका आरोप है कि सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया, क्योंकि राज्यसभा में विपक्ष के बहुमत को देखते हुए वह संभावित हार से बचना चाहती थी। जबकि सरकार का तर्क यह है कि आधार को मनी बिल के रूप में पारित कराने का उद्देश्य सरकारी पैसों को सब्सिडी के रूप में जरूरतमंदों को देना है। शीघ्र सर्वोच्च न्यायालय में इस पर बहस होगी कि धन विधेयक और वित्तीय विधेयक में क्या अंतर है। गौरतलब है कि सरकार के जीएसटी को धन विधेयक के तौर पर पेश करने के इरादे का भी विपक्ष ने विरोध किया है।
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संविधान के अनुच्छेद 110 के मुताबिक, कोई विधेयक मनी बिल या धन विधेयक तभी समझा जाएगा, जब उसमें केवल कर लगाने या हटाने, परिवर्तन करने, भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या  भारत सरकार का किसी को वित्तीय गारंटी देने, भारत की संचित निधि से धन निकालने, किसी खर्च को भारित व्यय घोषित करने तथा इससे जुड़े विषय से संबंधित होगा, जिनका उल्लेख इस अनुच्छेद में है। अनुच्छेद 109 में स्पष्ट व्यवस्था है कि धन विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा तो हो सकती है, पर उस पर यदि राज्यसभा असहमत हो, तो उसका कोई असर नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर, अनुच्छेद 117 के अनुसार, यदि किसी विधेयक में राजस्व और खर्च के अलावा और भी प्रस्ताव शामिल हों, तो वह वित्तीय विधेयक होगा, जिसे लोकसभा में ही राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से पारित किया जा सकता है।

सांविधानिक व्यवस्था के अनुसार, चौदह दिनों में अगर राज्यसभा मनी बिल को वापस लोकसभा में नहीं भेजती, तो उसे पारित मान लिया जाता है। मनी बिल पर राज्यसभा सिर्फ सलाह दे सकती है, लोकसभा उसे मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है। गौरतलब है कि राज्यसभा ने आधार विधेयक को पांच संशोधनों के साथ लोकसभा में लौटाया था। इन पांच संशोधनों में आधार पंजीकरण, सरकारी सेवाओं और सब्सिडी के लिए आधार की अनिवार्यता, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सूचना का सार्वजनिक किया जाना और निजी व्यक्तियों को आधार के उपयोग की अनुमति शामिल थी। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका फैसला अनुच्छेद 110 (3) के तहत लोकसभा अध्यक्ष करते हैं। चूंकि लोकसभा अध्यक्ष आधार विधेयक को पहले ही धन विधेयक घोषित कर चुकी थीं, इसलिए लोकसभा ने इससे संबंधित राज्यसभा के पांचों संशोधनों को खारिज कर दिया था।
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शीर्ष अदालत में सरकार की दलील यही होगी कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा संविधान के अनुच्छेद 109 के तहत लिए गए फैसले को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, क्योंकि संविधान के मुताबिक, धन विधेयक के मामले में लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है।  सर्वोच्च न्यायालय ने मोहम्मद सिद्दीकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2014) मामले में कहा था कि राज्य के स्पीकर द्वारा विधेयक वर्गीकरण की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती। संविधान के अनुच्छेद 122 में यह भी कहा गया है कि संसद की किसी कार्यवाही की विधिमान्यता को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। पर अनुच्छेद 147 से यह स्पष्ट है कि यदि संविधान की व्याख्या का प्रश्न उठता है, तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ही सक्षम है। इससे भी अहम तथ्य यह है कि राज्यसभा की तुलना विधान परिषद से नहीं की जा सकती। यदि राज्य विधानसभा और संसद एकमत हो जाएं और संसद कानून पारित कर दे, तो किसी भी विधान परिषद को भंग किया जा सकता है। पर राज्यसभा संघीय ढांचे का एक अभिन्न अंग है। केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि संघीय ढांचा संविधान का मौलिक स्वरूप है, राज्यसभा उस संघीय चरित्र को प्रतिबिंबित करती है, अतः उसे बदला नहीं जा सकता।

कोई भी सरकार संविधान की परिधि के अंदर ही कानून बना सकती है। यह तर्क संविधान सम्मत नहीं कि राज्यसभा कानूनी सुधार में रोड़ा अटका रही है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि कोई भी सरकार संविधान में संशोधन कर सकती है, यदि उसे संसद के दोनों सदनों द्वारा वांछित मत से पारित कराया जाता है। संविधान संशोधन दोनों सदनों को अलग-अलग और उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उस सदन के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से पारित कराना होता है। धन विधेयक, जो एक विशेष श्रेणी में आता है, उसे ही लोकसभा बिना राज्यसभा की सहमति से पारित कर सकती है। संविधान निर्माताओं ने राजस्व के मामले में ही लोकसभा को एकाधिकार दिया है। ऐसे विधेयक, जो अनुच्छेद 117 (1) की परिधि में आते हैं, उन्हें लोकसभा में राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से ही पारित किया जा सकता है। परंतु उसे दोनों सदनों में पारित कराना पड़ता है और यदि उनमें सहमति नहीं बनी या राज्यसभा छह महीने तक उसे पारित नहीं करती, तो संविधान में संयुक्त अधिवेशन बुलाने की व्यवस्था है। उल्लेखनीय है कि हरेक धन विधेयक वित्तीय विधेयक है, लेकिन प्रत्येक वित्तीय विधेयक धन विधेयक नहीं होता।

स्पीकर दंगल राजनीति से परे माने जाते हैं। उनके सामने क्या राय रखी गई, नहीं मालूम, पर आधार बिल को धन विधेयक के तौर पर पेश करने का मुद्दा ऐसा गंभीर विषय है, जो संविधान और सांविधानिक परंपराओं के गहन अध्ययन पर निर्भर करता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ही सक्षम है। इससे पहले लोकसभा अध्यक्ष के धन विधेयक संबंधी किसी निर्णय पर संदेह नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने 99वें संविधान संशोधन को, जिसे वर्तमान संसद ने ही पारित किया था, असांविधानिक घोषित कर दिया था। लिहाजा मौजूदा मुद्दे पर अब सारी निगाहें सर्वोच्च न्यायालय की ओर हैं।
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-लेखक लोकसभा के अवर सचिव रह चुके हैं।
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