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अभिव्यक्ति बनाम अपराध

Sun, 02 Dec 2012 12:59 AM IST
पवन दुग्गल (साइबर कानून विशेषज्ञ)
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हमारे देश की न्यायपालिका दुनिया की सबसे सक्रिय न्यायपालिकाओं में से एक है। इस समय भारतीय साइबर कानून के एक बेहद विवादास्पद और कठोर प्रावधानों की सांविधानिक वैधता की कानूनी चुनौती को निर्धारित करने का मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया है।
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कुछ हालिया घटनाओं के बाद सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के संशोधन की धारा 66 ए के दायरे और प्रभाव को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो गई है। इसी क्रम में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है। कानून की एक छात्रा की ओर से दायर इस याचिका पर न्यायालय ने केंद्र सरकार के साथ-साथ महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर छह हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है। और इस तरह भारतीय साइबर कानून के सिद्धांत के विस्तार और विकास को लेकर एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई है।
 
पिछले कुछ महीनों के दौरान देश के कई हिस्सों में इस कानून के तहत कई गिरफ्तारियां हुई हैं, जिससे इस विवाद को बल मिला है। पहले पश्चिम बंगाल में एक प्रोफेसर को फेसबुक पर एक कार्टून अग्रसरित करने के मामले में गिरफ्तार किया गया। फिर रवि श्रीनिवासन नामक शख्स के एक ट्वीट को इस कानून के दायरे में लाया गया। एक और मामले में मुंबई के के. वी. राव और मयंक को फेसबुक पर कुछ नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। पिछले दिनों बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई बंद के विरोध में फेसबुक पर टिप्पणी करने के कारण शाहीन और उसकी एक दोस्त को गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी दोस्त का कुसूर इतना था कि उसने वह टिप्पणी पसंद की थी। ये गिरफ्तारियां सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के लिए रोष का कारण बन गईं।
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दरअसल, कंप्यूटर या अन्य संचार माध्यमों से भेजी गई अनेक तरह की सूचनाएं धारा 66 ए के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकती हैं। जैसे कोई सूचना जो आक्रामक या डरावनी हो। या ऐसी सूचनाएं, जिनके बारे में आपको पता है कि वे गलत हैं, लेकिन परेशानी, असुविधा, खतरा, अवरोध या शत्रुता पैदा करने, चोट पहुंचाने, अपमानित करने, आपराधिक धमकी देने, नफरत फैलाने के उद्देश्य से भेजते हैं, तो ये अपराध की श्रेणी में आएंगी।

इसके अलावा ई-मेल के जरिये किसी को पीड़ा पहुंचाने, असुविधा पैदा करने, धोखा देने, किसी व्यक्ति को गुमराह करने के लिए कोई संदेश भेजा जाता है, तो वह भी अपराध की श्रेणी में आएगा। इसलिए अगर आप सोशल मीडिया से जुड़े हैं, तो सावधान रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे संदेशों की वजह से आप इस कानून के दायरे में आ सकते हैं।

समस्या यह है कि धारा 66 ए के तहत आने वाली कानूनी शब्दावली की भाषा और क्षेत्र बहुत व्यापक है।  इसी कारण इसके तहत कानून प्रवर्तक एजेंसियों द्वारा विभिन्न तरह की व्याख्याओं की आशंका बनी रहती है। दरअसल, धारा 66 ए में यह तो कहा गया है कि आक्रामक या डरावनी सूचनाएं इस कानून के दायरे में आ सकती हैं, लेकिन इस तरह के दिशा-निर्देश नहीं हैं कि कैसी सूचनाएं आक्रामक या डरावनी सूचनाओं की श्रेणी में आएंगी।

ऐसी सूचनाओं के चरित्र को समझने की जिम्मेदारी कानून-प्रवर्तक एजेंसियों के विवेक पर छोड़ दिया गया है। इस खंड के तहत आने वाली सभी व्यापक अर्थ वाली शब्दावलियों को परिभाषित नहीं किया गया है, इसलिए किसी परिस्थिति में इसके इस्तेमाल की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

इस तरह, वैधानिक मुक्त ऑनलाइन बातचीत का बड़ा हिस्सा धारा 66 ए दायरे में आ सकता है। प्रौद्योगिकी के उन्नयन के साथ इसके दुरुपयोग के तरीकों में भी बढ़ोतरी हुई है। ऐसी लाखों परिस्थितियां हो सकती हैं, जिनमें कोई सूचना इस कानून के हिसाब से अपराध की श्रेणी में शामिल कर ली जाए।

अब तक के अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि इस कानून को या तो बदल दिया जाए या फिर इसमें संशोधन या सुधार लाया जाए। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस कानून का फोकस प्रकाशित सामग्री पर नहीं, बल्कि भेजी गई सामग्री पर है। यह उस स्थिति में ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, जब आप इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, ई-मेल भेजते हैं, ब्लॉग प्रकाशित करते हैं या एसएमएस लिखते हैं और अपने कंप्यूटर या संचार माध्यमों से इसे भेजते हैं।

इसलिए, कंप्यूटर नेटवर्क और या इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के माध्यम से सूचनाएं भेजते समय बेहद सतर्क रहने की जरूरत है। संशोधित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 ए की राह में अनेक तरह की बाधाएं हैं। प्रतिष्ठा की रक्षा और नेटवर्क के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से इसके प्रावधान बनाए गए थे, जो अपने लक्ष्य तक पहुंचने में नाकाम रहे हैं। इस कानून की भाषा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के प्रावधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गलत इस्तेमाल, को रोकने से कोसों दूर है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गलत इस्तेमाल रोकने को पूरी तरह स्पष्ट करने की आवश्यकता है। डिजिटल और मोबाइल जैसे संचार माध्यमों के युग में मौजूदा कानून से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की क्षमता है। इसलिए आज के सोशल और डिजिटल मीडिया की वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाने और देश के संविधान के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए इस कानून में संशोधन की जरूरत है।

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 66 ए में निहित चुनौतियों और कानूनी पेचीदगियों की गहनता से जांच करने की संभावना है। देश में सोशल और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वालों की उम्मीदें और आकांक्षाएं अब सर्वोच्च न्यायालय से जुड़ गई हैं। इसलिए समय के साथ इस मामले से जुड़ी गतिविधियों को देखना काफी दिलचस्प होगा।
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