यकीनन देश के निर्यात में सुधार के कुछ संकेत उभरकर सामने आए हैं। वाणिज्य मंत्रालय के 15 सितंबर को जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात में अगस्त 2017 के दौरान शानदार तेजी देखी गई और इस दौरान निर्यात 10.29 फीसदी बढ़कर 23.81 अरब डॉलर पहुंच गया। जबकि इससे पिछले साल की समान अवधि में 21.59 अरब डॉलर का निर्यात हुआ था। इस वर्ष मार्च के बाद से निर्यात में लगातार चार माह तक गिरावट देखी जा रही थी। इसी तरह चालू वित्त वर्ष 2017-18 में अगस्त तक कुल निर्यात 8.57 फीसदी बढ़कर 118.57 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की समान अवधि में 109.21 अरब डॉलर था। नए आंकड़ों से पता चलता है कि निर्यात के प्रमुख 30 क्षेत्रों में से केवल चार में ही नरमी दर्ज की गई। इंजीनियरिंग क्षेत्र के साथ-साथ परिधानों और फार्मा क्षेत्र के निर्यात भी बढ़े हैं।
वस्तुत: निर्यात क्षेत्र में नए सुकून के बाद भी देश में निर्यात बढ़ाने की चुनौती कम नहीं हुई है। निर्यात को बढ़ावा देकर विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर को गति दी जा सकती है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में मौजूदा दाम पर जीडीपी के अनुपात में निर्यात 18.2 प्रतिशत रहा, जो वित्त वर्ष 2016-17 की समान तिमाही में 19.3 प्रतिशत था। यदि हम पिछले दो वर्षों के निर्यात परिदृश्य को देखें, तो पाते हैं कि वैश्विक निर्यात मांग कम होने से वर्ष 2015-16 में देश से कुल 269 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया गया। जबकि वर्ष 2016-17 में निर्यात का मूल्य 274 अरब डॉलर रहा। आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2014-15 में निर्यात 310 अरब डॉलर रहा था। निर्यात क्षेत्र की चुनौती और बढ़ेगी, क्योंकि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के मुताबिक, वर्ष 2018 तक भारत को निर्यात को सब्सिडी देना बंद करना होगा। सचमुच मंद होती वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्यात में बढ़ा लक्ष्य प्राप्त करना मुश्किल दिख रहा है। ऐसे में वर्तमान चुनौती का सामना करने के लिए नीति आयोग के सुधारवादी एजेंडे पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें विनिर्माण, छोटे व मंझोले उद्योग और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकारी नीतियों की अहम भूमिका बताई गई है।
भारतीय निर्यातकों के संगठन फियो का कहना है कि बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड जैसे देशों ने अपने निर्यातकों को पर्याप्त सुविधा देकर भारतीय निर्यातकों के सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है। निर्यातकों का कहना है कि जीएसटी रिफंड लेने में कठिनाई आ रही है। सरकार ने रिफंड दस्तावेज फाइल करने की तिथि बढ़ा दी है। निर्यातकों को पहले उन वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति थी, जिनका इस्तेमाल वे निर्यात के लिए माल तैयार करने के लिए करते थे। लेकिन जीएसटी के बाद शुल्क का भुगतान करना होगा और बाद मे रिफंड के लिए आवेदन करना होगा। रुपये की तेजी से बढ़ी मजबूती और ऊंची कीमत से निर्यात बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता कम हुई है।
मोदी सरकार का लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुना करना भी है। इसके लिए कृषि निर्यात भी बढ़ाना पड़ेगा। जाहिर है, नए वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु की चुनौतियां कम नहीं हैं। इसमें निर्यात वृद्धि के दीर्घकालिक प्रयासों के तहत निर्यात कारोबार का कमजोर बुनियादी ढांचा सुधार अहम है। खासतौर से समुद्री व्यापार से संबंधित बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सार्क के पड़ोसी देशों और अफगानिस्तान में भारत के निर्यात बढ़ने की संभावनाएं हैं। ब्रिक्स देशों और म्यांमार व मलयेशिया सहित आसियान देशों को भी निर्यात बढ़ सकता है।