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संरक्षण गृह में शोषण

सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 02 Aug 2018 06:37 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली

मुजफ्फरपुर के एक ‘संरक्षण गृह’ में 44 में से 34 नाबालिग लड़कियों के साथ हुए बलात्कार की खबर हमारे सामने कई प्रश्न प्रस्तुत करती है। क्या समाज हमेशा इतना क्रूर था या वर्तमान में क्रूरता बढ़ी है? पहले जो कुछ होता था, उसकी छूट समाज और सत्ता-तंत्र की ओर से दी जाती थी। बड़े लोग किसी के साथ कुछ भी कर सकते थे। पर कानून में लाए गए परिवर्तनों के बाद कुछ नियंत्रण लगाए गए। ऐसा हमारे देश में भी हुआ। जबकि हमारी परंपरा में दंड तय करने के लिए अपराध किसके साथ हुआ और अपराधी कौन है, यह देखना जरूरी समझा जाता था। संविधान इस सोच को समाप्त करने के लिए बना था। उसमें दर्ज समानता के सिद्धांत का यही अर्थ है कि हर अपराध की सजा सामान्य होगी। इसका कुछ असर समाज में दिखने लगा था। पिछले कुछ वर्षों में हम पीछे जाने लगे हैं। अपराधी कौन है, अपराध किसके साथ हुआ है, यह फिर महत्वपूर्ण हो गया है। मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, का रुख भी पिछले कुछ वर्षों में बहुत बदल गया है। निर्भया के साथ हुई बर्बरता के खिलाफ पूरा मीडिया मैदान में था। पर अब मीडिया भी चयन करने लगा है। अपराधी अगर पादरी है या अपराध मदरसे में हुआ है, तो चौबीस घंटे यह खबर देश भर की आत्मा को झकझोरती रहेगी, जो बुरी बात नहीं। बुरा यह है कि मुजफ्फरपुर की वीभत्स घटना टीवी स्क्रीन से गायब है।



मुजफ्फरपुर में सेवा संकल्प नामक संस्था (एनजीओ) बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग से अनुदान प्राप्त कर दो ‘संरक्षण गृह' चला रही थी। इसके सीईओ बृजेश ठाकुर हैं, जिनकी ऊंची पहुंच है। स्थानीय भाजपा विधायक उनके दोस्त हैं। जिस अखबार की मात्र तीन सौ प्रतियां बिकती हैं, उसे केंद्र से करोड़ों का विज्ञापन मिलता है। संरक्षण गृह में दस से चौदह साल की कई लड़कियां मानसिक रूप से विक्षिप्त पाई गईं। इस साल, मुंबई टीआईएसएस की शोध टीम ने संरक्षण गृह का सर्वेक्षण किया और लड़कियों से एकांत में बात की। लड़कियां बहुत डरी हुई थीं। उन्होंने अपनी बात नहीं रखी। एक कहती कि दूसरी के साथ गड़बड़ हुई है; दूसरी कहती कि ‘अंकल’ लोग परेशान करते हैं;  तीसरी ने बताया कि रात में कहीं ले जाते हैं और कुछ करते हैं, जिससे पूरे शरीर में दर्द होता है। विगत मई में टीम ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को दी और उसने उसके बाद संस्था को एक और किस्त आवंटित की। फुसफुसाहट होने लगी। तथ्य सार्वजानिक होने लगे। सत्तारूढ़ जदयू की समाज कल्याण मंत्री के पति का नाम भी ‘अंकल’ लोगों में शामिल होने लगा और एफआईआर दर्ज करने की मजबूरी बन गई। मेडिकल जांच में 44 में से 34 लड़कियों के साथ बलात्कार होना साबित हुआ। बृजेश ठाकुर फरार हो गए। विधानसभा में हल्ला मचा। आखिरकार ठाकुर की गिरफ्तारी हुई और सीबीआई को जांच भी सौंपी गई।

 

अभी इस कहानी में बहुत कुछ बाकी है। जिस लड़की ने बृजेश ठाकुर के खिलाफ गवाही दी थी, वह गायब हो गई है; ठाकुर द्वारा संचालित दूसरे गृह से सभी ग्यारह लड़कियां गायब हैं। बृजेश ठाकुर की पत्नी कहती हैं, संरक्षण गृह में रहने वाली लड़कियां बदचलन थीं। ऐसा कहना और मानना समाज को अपराधी भेड़ियों के हवाले करने के बराबर है।


मीडिया से उसकी चुप्पी पर सवाल करना जरूरी है। सरकार से उसके व्यवहार के बारे में सवाल करना जरूरी है। नेता-प्रशासन-सत्ता के अपराधी गठबंधन के बारे में सवाल करना जरूरी है। इन सबका विरोध करना और भी जरूरी है। दो अगस्त को वामपंथी पार्टियों ने महिला और दलित उत्पीड़न के खिलाफ बिहार बंद का आयोजन किया। हम किस पाले में हैं?

 

-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य।

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