भारत के सशस्त्र बलों के 25 लाख से अधिक वेटरन्स (सेवानिवृत्त फौजी) हैं, जिनमें से अधिकांश अच्छी तरह से प्रशिक्षित, उत्प्रेरित और आला दर्जे के कौशल से लैस नागरिक हैं, जो आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने को तत्पर हैं।
इसमें हर साल लगभग साठ हजार सैनिकों का और इजाफा हो जाता है। वेटरन में शामिल होने वाले अधिकांश सैनिकों की उम्र 35 से 45 वर्ष के बीच की होती हैं। हालांकि, इनमें से अधिकांश चरणबद्ध सेवानिवृत्ति की ओर अग्रसर हैं या ऐसी नौकरियों में अटके हैं, जो उनके विशिष्ट कौशल का सही तरीके से उपयोग नहीं कर सकती हैं।
जहां तक सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली नौकरियों का सवाल है, इसे लेकर बहुत अच्छी राय नहीं है- सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के बीच कराए गए एक सर्वेक्षण में 84 फीसदी ने बताया कि उन्हें पुनर्वास की मौजूदा सुविधाओं से लाभ नहीं हुआ है; इसी तरह, एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि वायु सेना के 82 फीसदी वेटरन को पुनर्वास में किसी भी प्रमुख संस्थान से कोई सहायता नहीं मिली। ज्यादातर सैनिकों के लिए, सेवानिवृत्ति आमतौर पर जल्दी होती है, हालांकि 'सेवानिवृत्ति' शब्द खुद ही भ्रामक है।
वास्तव में ज्यादातर सैनिकों को करियर में बदलाव से समायोजन करना पड़ता है। इस तरह का मध्य-आयु में नागरिक जीवन का संक्रमण वास्तव में पुनः सामाजीकरण की प्रक्रिया है, जो एक तनावपूर्ण काम है। वन रैंक वन पेंशन पर अब भी बहस जारी है, ऐसे में पुनर्वास पर गंभीरता से सामाजिक अध्ययन की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि वेटरन के लिए कोई संस्थागत चिंता नहीं है। केंद्रीय सैनिक बोर्ड के तहत काम कर रहे जिला सैनिक बोर्ड, अधिकांश जिलों में हैं। ये पूर्व सैनिकों के लिए जमीनी स्तर पर सुविधाएं मुहैया कराते हैं, और इनसे उन्हें फौरी व स्थायी रोजगार पाने में मदद मिलती है। कैंटीन स्टोर्स विभाग पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को सब्सिडी में कैंटीन सेवाएं देना जारी रखता है। सशस्त्र बलों की स्थानीय सेवा संस्थाएं पूर्व सैनिकों को प्रशासनिक सेवाएं मुहैया कराती हैं, जबकि आर्म्ड फोर्सेज वाइव्स वेल्फेयर एसोसिएशन (एएफडब्ल्यूडब्ल्यूए) पूर्व सैनिकों की पत्नियों और बच्चों को कई प्रकार की वित्तीय और गैर-वित्तीय सहायता प्रदान करती है। वेटरन को एक्स सर्विसमेन कॉन्ट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम के फायदे हासिल होते हैं, जिससे वे ईसीएचएस सिस्टम के माध्यम से कैशलेस चिकित्सा सुविधाओं का लाभ ले सकते हैं।
प्लेसमेंट सेल, विशेष रूप से वायुसेना (जिसे संतुष्टि स्तर पर कम आंका गया है) में, और सरकारी रोजगार केंद्र भी नौकरियां हासिल करने में मदद करते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में, बैंकों की तरह आरक्षण नीतियों की एक शृंखला है, जिनका सशस्त्रबलों के कर्मी लाभ उठा सकते हैं - हालांकि, इनमें से सिर्फ 16-18 फीसदी लोग वास्तव में लाभान्वित हुए हैं। यह उदासीनता एक हद तक न सिर्फ ऐसे अवसरों के बारे में जानकारी के अभाव के कारण है, बल्कि जरूरी योग्यता परीक्षाओं को पास नहीं कर पाने के कारण भी है। अच्छा तो यह हो कि, सरकार सेवानिवृत्त फौजियों के लिए, नौकरियों में, खासकर केंद्रीय सुरक्षा बलों में समायोजन के मौकों का विस्तार करे।
इधर, निजी क्षेत्र में, सैन्य कर्मियों को ज्यादातर सुरक्षा से जुड़ी नौकरियों में ही रखा जाता है। हालांकि कॉरपोरेट जगत में वेटरन को बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता है, लेकिन उन्हें अधिक योग्य उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा में रखने को लेकर झिझक है। वेटरन के लिए अवसर बढ़ाना एक बुनियादी चिंता है- सरकारी रोजगार केंद्रों को प्राथमिकता के आधार पर उनके लिए नौकरी के अवसरों का पता लगाना चाहिए।
सैन्य कर्मियों को फिर से नया कौशल सिखाना बुनियादी चिंता बन जाता है। डायरेक्ट्रेट जनरल ऑफ रिसेटलमेंट (डीजीआर) दूसरे करियर के वास्ते वेटरन की तैयारी के लिए नाममात्र का शुल्क लेता है-यह प्रतिष्ठित संस्थानों में विभिन्न पाठ्यक्रमों के आयोजन के साथ एक संक्रमण की योजना बनाने पर केंद्रित होता है। हालांकि, इनमें से कई पाठ्यक्रम, उच्च गुणवत्ता के होने के बावजूद, बाजार की जरूरतों के हिसाब से प्रासंगिक नहीं हैं, और सैनिकों को नागरिक संक्रमण के लिए तैयार नहीं करते हैं।
पारिवारिक जिम्मेदारियां और सेवानिवृत्ति के बाद की योजना के चलते ऐसे पाठ्यक्रमों का बहुत ज्यादा लोग चुनाव नहीं करते हैं ( औसतन 170 सालाना; रक्षा मंत्रालय, 2016)। आदर्श स्थिति यह होगी कि डीजीआर उपयोगी सर्टिफिकेट्स और पाठ्यक्रमों की जरूरतों को समझने के लिए गहराई से उद्योग के साथ मिलकर काम करे। इन पाठ्यक्रमों को बाजार में उपलब्ध नौकरियों की जरूरत के हिसाब से री-पैकेज किए जाने की जरूरत है, जो औद्योगिक साझीदारों के समूह में रोजगार गारंटी देता हो। इस तरह की व्यवस्था में ऐसे कुशल वेटरन की सालाना उपलब्धता को सरकारी कार्यक्रमों से भी जोड़ने की जरूरत है।
सरकारी मंत्रालयों और कार्यक्रमों के साथ स्ट्रेटजिक साझेदारी, जिसमें 'मेक इन इंडिया' और 'स्किल इंडिया' भी शामिल हो, से वेटरन में उद्यमशीलता के साथ-साथ कौशल विकास करने में काफी मदद मिलेगी।
ध्यान दीजिए कि ब्रिटेन यह काम कैसे करता है - ब्रिटिश सरकार ने आर्म्ड फोर्सेज अनुबंध (2011) में पुनर्वास सुनिश्चित करने को अपना समर्थन दिया है, और इसके द्वारा सशस्त्र बलों में सेवा करने से हो सकने वाले किसी भी नुकसान की भरपाई का वायदा किया गया है, जिसमें कर्ज लेने, हेल्थकेयर (स्वास्थ्य सेवा) या सोशल हाउसिंग के साथ ही उन्हें नौकरी पाने में मदद की जाती है।
आदर्श स्थित तो यह होगी कि, सेवानिवृत्ति के बाद, वेटरन को अपने लिए मदद मांगने के लिए बेसहारा न छोड़ा जाए। प्रभावी पुनर्वास के बिना, सेवा में कार्यरत जवानों के मनोबल को बनाए रखना कठिन होगा, और यह प्रतिभाशाली युवाओं को सशस्त्र बलों में शामिल होने से हतोत्साहित करेगा।