वर्तमान में 46 करोड़ टन प्लास्टिक के उत्पादन में से दो टन सीधे तौर पर प्रदूषण का कारक बन रहा है। मोटे अनुमान के अनुसार, 25 वर्षों में प्लास्टिक से हो रहा नुकसान उसके चार गुना उत्पादन वृद्धि के साथ 281 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा। प्लास्टिक पर वैश्विक संधि के पूर्ववर्ती वार्ताओं में असहमति का मुख्य कारण इसके क्रियान्वयन की सीमाओं को लेकर रहा है, विकसित देशों का एक बहुत बड़ा वर्ग संधि को मात्र प्लास्टिक से उत्पन्न कचरे तक सीमित रखना चाहता है, जबकि दूसरा वर्ग बाध्यता को डिजाइन से लेकर निष्पादन तक जुड़े हुए समस्त अवयवों को शामिल करने की मांग कर रहा है। इस मांग के तहत प्लास्टिक उत्पादन के लिए उपयोग हो रहे हानिकारक रसायनों पर पाबंदी को भी शामिल करना है। दूसरी सबसे बड़ी असहमति प्लास्टिक के विकल्प खोजने और आमजन तक पहुंचाने के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता जुटाने को लेकर है। प्लास्टिक के विकल्प खोजने के लिए न तो सभी देश सक्षम हैं और न ही सभी के उपभोग का समान तरीका है।
वैश्विक रूप से निर्णायक संधि नहीं होने के कारण समस्त राष्ट्रों द्वारा समान रूप से रणनीति को अमल में नहीं लाया जा रहा है। यदि कहीं प्रतिबंध है, तो उससे लगती हुई सीमा पर उत्पादन एवं उपयोग बेरोकटोक चल रहा है। संयुक्त राष्ट्र की इस संधि के माध्यम से प्लास्टिक के उत्पादन से लेकर उपयोग तक हर स्तर पर अंकुश लगाने का प्रयास अपेक्षित है। यदि पृष्ठभूमि को देखा जाए, तो आम सहमति नहीं बन पाई है, जैसे अमेरिका ने स्वयं को जलवायु परिवर्तन संबंधी पहल से अलग कर रखा है, उसी प्रकार तेल उत्पादक राष्ट्र समझ के बावजूद पॉलीमर उत्पादन पर रोक के लिए सहमत नहीं हैं। विकसित देश कहीं भी स्वयं के कृत्यों की भरपाई करने में रुचि नहीं प्रदर्शित करते और सक्षमता के चलते वार्ताओं का रुख अपनी ओर कर देते हैं। अपेक्षा है, जेनेवा में चल रही प्लास्टिक प्रदूषण संबंधी वार्ता निर्णायक साबित होगी, जिसके तहत प्लास्टिक उत्पादन में कमी, पुनःचक्रण के मानदंड, प्रदूषण रोकने संबंधी पुख्ता कदम, शोध संबंधी प्रावधानों के साथ-साथ अल्प आय श्रेणी के राष्ट्रों को विकसित राष्ट्रों द्वारा आर्थिक सहयोग देने पर भी सहमति बनेगी। इस संधि का होना सृष्टि के लिए भी नितांत आवश्यक है। अमेरिका के वर्तमान रुख को देखते हुए यह भी आशंका है कि कहीं फिर एक बार वार्ता अगले दौर के लिए स्थगित न हो जाए।