टैरिफ के झटके और ट्रंप के तीखे हमलों से भारत में बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। ट्रंप ने भारत को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ बताया, जिस पर काफी हंगामा हुआ। राहुल गांधी ने ट्रंप के बयान के प्रति सहमति जताई। वह सरकार और राष्ट्र की आलोचना के बीच अंतर करने में विफल रहे। विपक्षी नेताओं को अपनी टिप्पणियों पर संयम बरतने की जरूरत है। ट्रंप के बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, पर शाब्दिक रूप से नहीं। ट्रंप भारतीय अर्थव्यवस्था का सटीक आकलन करने के लिए पूरी तरह से योग्य नहीं हैं। भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। इसका भविष्य भारतीयों द्वारा तय किया जाएगा। भारत के बारे में ट्रंप की टिप्पणी को उनकी हताशा ही समझी जानी चाहिए।
ट्रंप ने भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को और अधिक दंड का कारण बताया। यह दृष्टिकोण भारत के ऊर्जा सुरक्षा के अधिकार को प्रभावित करता है। उनकी इस अपेक्षा से पाखंड की भी बू आती है। ऊर्जा सूचना एजेंसी ने खुलासा किया है कि अमेरिका हाल तक रूस से यूरेनियम आयात करता था, और उसकी कंपनियां 2028 तक छूट मांग सकती हैं। यूरोपीय संघ की संसद की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि रूस से गैस आयात 2027 के अंत तक जारी रहेगा। हाल ही में नाटो प्रमुख मार्क रूट ने भारत को प्रतिबंधों की चेतावनी दी थी। विडंबना यह है कि उनके देश, नीदरलैंड ने रूसी यूरेनियम का आयात किया है। वास्तव में बताया गया है कि रूसी कंपनी रोसाटॉम नीदरलैंड के जरिये यूरेनियम से होने वाले मुनाफे का प्रबंधन करती है।
असल में अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी नियामक मंजूरियों को ज्यों का त्यों स्वीकार कर ले, जिससे भारत के संप्रभु अधिकारों का हनन होता है। वह सोया और मक्का के साथ-साथ अन्य आनुवंशिक रूप से संशोधित उत्पादों का निर्यात करना चाहता है, जो भारत के लिए आत्मघाती हो सकता है। इसके अलावा, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों से संबंधित मामले सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। अमेरिका यह भी चाहता है कि भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों को मंजूरी दे। यह भारतीय किसानों के लिए एक खतरा है और अमेरिकी डेयरी उद्योग द्वारा पशु आहार के रूप में मांस, मुर्गी और मछली के अर्क सहित पशु प्रोटीन का उपयोग सामाजिक-सांस्कृतिक विवाद को जन्म दे सकता है। आगामी 25 अगस्त को जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर चर्चा होगी, तो उम्मीदों में तालमेल बिठाना और खींचतान व दबाव के कारकों को परिभाषित करना मुश्किल होगा। जैसा कि अमेरिकी कहते हैं, कोई भी समझौता तब तक पूरा नहीं होता, जब तक वह हो न जाए! हम बातचीत के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि यह ‘मात्र एक छोटी-सी चूक’ है, जिससे जीडीपी में मुश्किल से 0.2 प्रतिशत की कमी आएगी; और कुछ लोग इसे संभावित संकट मानते हैं। सच्चाई इन दोनों के बीच है। इसका आकलन करते समय लोग जो आम गलती करते हैं, वह यह है कि वे तत्काल प्रभाव को ज्यादा और दीर्घकालिक प्रभावों को कम आंकते हैं। आपूर्ति शृंखला में छोटे उद्यमों और आभूषण एवं परिधान जैसे श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों पर टैरिफ के प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता। विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत का मुख्य उद्देश्य चीन+1 सिद्धांत था। यह मूलतः चीन से आपूर्ति प्राप्त करने वाली वैश्विक कंपनियों के भारत आने की आशा है। टैरिफ से विदेशी अवसरों को आकर्षित करने की महत्वाकांक्षा पटरी से उतर सकती है, क्योंकि वियतनाम, इंडोनेशिया, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे प्रतिस्पर्धी देशों में टैरिफ कम हैं। यह याद रखना भी जरूरी है कि अमेरिका भारत में एफडीआई के शीर्ष तीन स्रोतों में से एक है।
टैरिफ का यह झटका कुछ सबक भी सिखाता है। भारत में आखिरी बड़ा सुधार 1991 में व्यापार उदारीकरण और लाइसेंस राज का खात्मा था। तब से, भारत का राजनीतिक वर्ग कृषि, श्रम कानूनों और नियमों जैसे सुधारों के लिए मजबूत आम सहमति की तलाश कर रहा है। टीमलीज रेगटेक की रिपोर्ट बताती है कि नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 799 विशिष्ट अनुपालनों की आवश्यकता होती है। 2025 तक, 6,21,000 कर अपीलें लंबित हैं। 2024-25 के आर्थिक सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण क्षेत्रों (भूमि, निर्माण, श्रम, यूटिलिटीज एवं लॉजिस्टिक) की सूची दी गई है, जहां मानकों और परमिटों को राज्य नियंत्रित करते हैं, और नियम व दंड लगाते हैं। ये आदेश अतीत में अटके हुए हैं। व्यापार और भू-राजनीति में रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश के लिए सरकारों को घरेलू अर्थव्यवस्था को परेशान करने वाले तत्वों का सफाया करना होगा। भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का बढ़ना स्वागतयोग्य है। हालांकि, घरेलू बाजार में खरीदारी करने के लिए प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की आवश्यकता है।
यह याद रखना जरूरी है कि आधुनिक दुनिया में ताकतवर भी दूसरे पर निर्भर होते हैं। चीन इसलिए टैरिफ के झटके को पीछे धकेलने में कामयाब रहा है, क्योंकि उसने कृषि, शिक्षा, ऊर्जा और निवेश में सुधारों के जरिये विकास को गति दी है। इससे उसे बैटरियों से लेकर दुर्लभ खनिजों और वस्तुओं तथा अन्य कई उत्पादों तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था की निर्भरता का फायदा उठाने में मदद मिलती है। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह पुनर्गठित करने की जरूरत है कि ऐसी निर्भरताएं पैदा हों, जिनका लाभ उच्च भू-राजनीतिक मंच पर उठाया जा सके।