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हर खोज सिएटल में हो, जरूरी नहीं

Tue, 21 Oct 2014 10:47 AM IST
हावर्ड शुल्त्ज
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एटल में 1971 में अपनी पहली कॉफी शॉप खोलने के बाद से स्टारबक्स ने 62 विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों में 18 हजार से अधिक नए स्टोर खोले हैं। लेकिन जैसी शुरुआत अक्तूबर, 2012 में मुंबई में अपने अग्रणी स्टोर के उद्घाटन से हुई, वैसी कभी नहीं हुई। दक्षिण मुंबई में हमारा स्टोर ऐतिहासिक एलफिंस्टन बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर है।
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उद्घाटन की पहली रात हमने अपने भारतीय बिजनेस पार्टनर टाटा ग्रुप के साथ मिलकर भारत की प्रायः सभी बड़ी हस्तियों को आमंत्रित किया था। उस समय टाटा ग्रुप के चेयरमैन रतन टाटा थे।

इसके बाद हमने और स्टोर खोले। हम भारत में हजारों स्टोर खोलेंगे और वह दिन दूर नहीं, जब उत्तर अमेरिका के बाहर भारत और चीन, हमारे दो सबसे बड़े बाजार होंगे। इस लक्ष्य तक पहुंचना आसान नहीं होगा। भारत में शुरुआत करने में ही हमें छह साल लगे। लेकिन इससे हमने न केवल भारत के बारे में, बल्कि अपने बारे में भी काफी कुछ सीखा। हमने कई वर्षों तक भारत को विकसित होते देखा। हमने देखा कि सफलता के लिए जरूरी आधार बन रहा है। महत्वाकांक्षाओं से भरा और पश्चिमी संस्कृति और ब्रांडस के प्रति उत्साहित एक बढ़ता हुआ मध्यवर्ग उभरा है, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हो रहा है और विदेशी पूंजी निवेश के लिए नियमन ढांचे में स्वस्थ परिवर्तन होने लगे हैं। इधर भारत का कॉफी बाजार 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। हमने कई बार भारतीय बाजार में घुसने की कोशिश की, लेकिन हर बार बाधाएं आईं। अंततः अक्तूबर, 2010 को मैं अपने संभावित बिजनेस पार्टनरों में से किसी एक को चुनने के लिए भारत आया।
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टाटा ग्रुप इनमें अग्रणी था। लेकिन रतन टाटा से हमारी मुलाकात से पहले उनके लोगों ने हमसे कर्नाटक चलने को कहा, जहां टाटा के कॉफी फॉर्म हैं। हमें वहां विशेष जरूरतों वाले बच्चों के एक स्कूल ले जाया गया। इन बच्चों में से कइयों के माता-पिता कॉफी फार्मों में काम करने वाले प्रवासी श्रमिक हैं। बच्चों ने हमारे लिए एक नाटक का मंचन किया, जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ। उस स्कूल में कहीं भी टाटा का नाम नहीं दिखाई दिया। वे किसी शोहरत के लिए स्कूल नहीं चलाते। तब मुझे यह लगा कि यही तो वह चीज है, जो स्टारबक्स में हमें करनी हैं।

जनवरी, 2012 में हमने टाटा के साथ संयुक्त उद्यम की घोषणा की। अच्छे लोगों को आकर्षित करना हमारे लिए महत्वपूर्ण था। हमने यह भी ध्यान रखा कि हम कैसे विनम्र दिखें और अपने कर्मचारियों और ग्राहकों से अंतरंग रिश्ता कायम करें।
टाटा के साथ हमारे रिश्ते का एक अनोखा पहलू यह है कि कॉफी के बीज यहीं से लेकर यहीं रोस्ट (भूने) किए जा सकते हैं। टाटा का एशिया में सबसे बड़ा कॉफी एस्टेट है। वे न केवल कॉफी उगाते हैं, बल्कि उनके पास रोस्टिंग की भी सुविधा है। इसलिए उनके साथ मिलकर हम भारत के लिए एक इंडिया-ओनली एक्सप्रेसो रोस्ट कॉफी विकसित कर सके, जिसकी हर चुस्की उतनी ही बढ़िया है, जितनी कि हम दुनिया भर को मुहैया कराते हैं।

स्टारबक्स में कॉफी विभाग में काम करने वाले हमारे लोगों की बड़ी इज्जत है। जब मैंने उनसे भारत के लिए कुछ अलग करने-एक अलग तरह का ब्लेंड तैयार करने को कहा, तो वे उत्साहित नहीं हुए। मैंने उनसे कहा कि भारत के लिए कॉफी का मिश्रण हमारी टीम नहीं बनाएगी। उनका तर्क था कि गुणवत्ता की क्या गारंटी रहेगी। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि भारत के लिए कैसा ब्लेंड हो, इसका अंतिम फैसला वे ही करेंगे। यह वास्तव में हमारी अपने नए पार्टनर में भरोसे की असली परीक्षा थी। इसके लिए हमें अपने कुछ रोस्टिंग सीक्रेट्स, जो हमने पिछले चार दशकों में हासिल किए, टाटा को बताने पड़े। हमारी कॉफी टीम छह बार भारत गई। करीब सौ बार कॉफी चखकर परीक्षण किया गया। और अंत में इंडियन एक्सप्रेसो रोस्ट, जिसके बीज टाटा से ही लिए गए और वहीं उन्हें रोस्ट किया गया, एक बहुत बढ़िया ब्लेंड के रूप में सबके सामने आया। इस प्रक्रिया में हमने सीखा कि हरेक चीज की सिएटल में ही खोज करने की जरूरत नहीं है क्योंकि अगर भरोसा हो तो हम मिल-जुलकर काम कर सकते हैं और नई इबारत लिख सकते हैं।
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